एक कवि जो गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ने को तैयार था

‘जब भी किसी
गरीब आदमी का अपमान करती है
ये तुम्हारी दुनिया,
तो मेरा जी करता है
कि मैं इस दुनिया को

 

यूँ तो हिंदी साहित्य में बहुत कवि रहे हैं और पहले से ज्यादा आज लेखन में सक्रिय हैं। लेकिन इन्ही कवियों में से एक कवि हुआ जो मौत के मुँह में लाठी धकेल सकता था। बहुत बड़ी लंबी प्लानिंग के साथ सत्ता से दो दो हाथ करने आया था, गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ने वाला था। इस कवि का नाम है रामशंकर यादव “विद्रोही”। विद्रोही अपने मिजाज के एकलौते कवि थे। उनके द्वारा कविता “लिखी नहीं लिखी” जाती थी। विद्रोही वाचिक परंपरा के कवि हैं। जब वो कवितायेँ सुनाते थे तो एक सामान्य पाठक उनसे बहुत आसानी से जुड़ जाता था और कविता को पूरी संवेदना के साथ सुनता था। विद्रोही को रुखसत हुए करीब दो साल हो गए हैं पर हिंदी साहित्य जगत की विडंबना देखिये कि इस कवि का मूल्यांकन अब तक नहीं हुआ। मूल्यांकन तो दूर उसकी कविताओं का दूसरा संग्रह अभी तक नहीं आया। आज हिंदी कविता में आयँ-बाएं-शाय लिखने वालों की कमी नहीं है लिख रहे और आलोचक उस पर लहालोट भी हो रहे हैं। याद करिये पोएट्री मैनजेमेंट को। विद्रोही ने अपनी जिंदगी को जिस तरह से भोगा और बरता है उसकी मुकम्मल तर्जुमानी उनकी कविता में है। विद्रोही की कविता मोहनजोदड़ो अकेले कविता के नाम पर जलेबी छानने वाले कवियों की सारे कविता संग्रहों पर भारी पड़ती है। पढिये
मोहनजोदड़ो
1.
मैं साइमन,
न्याय के कटघरे में खड़ा हूं,
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दें!

मैं वहां से बोल रहा हूं
जहां मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी है,
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियां बिखरी पड़ी हैं।
इसी तरह एक औरत की जली हुई लाश
आपको बेबीलोनिया में भी मिल जाएगी,
और इसी तरह इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां
मेसोपोटामिया में भी।

मैं सोचता हूं और बारहा सोचता हूं
कि आखिर क्या बात है कि
प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर
एक औरत की जली हुई लाश मिलती है
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां मिलती हैं
जिनका सिलसिला
सीथिया की चट्टानों से लेकर बंगाल के मैदानों तक
और सवाना के जंगलों से लेकर कान्हा के वनों तक चला जाता है।

2.
एक औरत जो मां हो सकती है,
बहिन हो सकती है,
बीवी हो सकती है,
बेटी हो सकती है,
मैं कहता हूं
तुम हट जाओ मेरे सामने से,
मेरा खून कलकला रहा है,
मेरा कलेजा सुलग रहा है,
मेरी देह जल रही है,
मेरी मां को, मेरी बहिन को, मेरी बीवी को
मेरी बेटी को मारा गया है,
मेरी पुरखिनें आसमान में आर्तनाद कर रही हैं।
मैं इस औरत की जली हुई लाश पर…
सिर पटक कर जान दे देता अगर
मेरे एक बेटी न होती तो…
और बेटी है,
कि कहती है
कि पापा तुम बेवजह ही हम
लड़कियों के बारे में इतने भावुक होते हो!
हम लड़कियां तो लकडि़यां होती हैं
जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं।

और ये इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां
रोमन गुलामों की भी हो सकती हैं
और बंगाल के जुलाहों की भी,
या अतिआधुनिक वियतनामी, फिलिस्तीनी, इराकी
बच्चों की भी।

साम्राज्य आखिर साम्राज्य ही होता है,
चाहे वो रोमन साम्राज्य हो,
चाहे वो ब्रिटिश साम्राज्य हो,
या अतिआधुनिक अमरीकी साम्राज्य।
जिसका एक ही काम है कि
पहाड़ों पर, पठारों पर,
नदी किनारे, सागर तीरे,
मैदानों में, इंसानों की हड्डियां बिखेर देना।
जो इतिहास को तीन वाक्यों में
पूरा करने का दावा पेश करता है-
कि हमने धरती पर शोले भड़का दिए,
कि हमने धरती में शरारे भर दिए,
कि हमने धरती पर इंसानों की हड्डियां बिखेर दीं।

लेकिन मैं
स्पार्टकस का वंशज,
स्पार्टकस की प्रतिज्ञाआंे के साथ जीता हूं-
कि जाओ कह दो सीनेट से-
कि हम सारी दुनिया के गुलामों को इकट्ठा करेंगे,
और एक दिन रोम आएंगे जरूर।

लेकिन हम कहीं नहीं जाएंगे,
क्योंकि ठीक इसी समय जब मैं
ये कविता आपको सुना रहा हूं,
लातिन अमरीकी मजदूर
महान साम्राज्य के लिए कब्र खोद रहा है
और भारतीय मजदूर उसके
पालतू चूहों के बिलों में पानी भर रहा है।
एशिया से लेकर अफ्रीका तक
घृणा की जो आग लगी है
वो आग बुझ नहीं सकती है दोस्त!
क्योंकि वो आग
एक औरत की जली हुई लाश की आग है,
वह आग इंसानों की बिखरी हुई हड्डियों की आग है।

इस कविता में आप विद्रोही के इतिहासबोध को देख सकते हैं। विद्रोही ने असल दुश्मन की शिनाख्त कर दी है।

 

“3 दिसंबर 1957 को अइरी फिरोजपुर (सुल्तानपुर, उ.प्र.) में जन्मे रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ 1980 में जेएनयू एम.ए. करने आए थे। यहीं वामपंथी आंदोलन के संपर्क में आए। 1983 में छात्र आंदोलन में उन्होंने बढ़चढ़कर शिरकत की और जेएनयू से निकाल दिए गए। लेकिन छात्रों के बीच उनकी लोकप्रियता के कारण कई बार चाहकर भी जेएनयू प्रशासन उन्हें वहां से बाहर नहीं कर पाया। जनता का कवि होने का अभिमान है विद्रोही को। साहित्य के नामवरों की अनदेखी तथा पूंजी और बाजार द्वारा तय श्रेष्ठता के पैमानों की उन्हें कोई परवाह नहीं है। वे तो बड़े गर्व से कहते हैं- मेरे हौसले पर नजाकत झुकी है/ विरासत है सबको दिए जा रहा हूं। और इस विरासत की कितनी पूछ है यह जसम के सांस्कृतिक संकुल (सांस) की ओर से प्रकाशित उनके पहले कविता संग्रह ‘नई खेती’ की मांग बताती है। दिल्ली से लेकर बिहार तक उनके चाहने वालों की लंबी कतार है।(सुधीर सुमन)”

 

One thought on “एक कवि जो गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ने को तैयार था

  1. Comrade Ram shankar yadav ko lal salam, bahot achha lekh hai. Or aysi mahan hastiyon k bare me logon ko batane ki zaroorat hai. Shubh kamnayen

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