निर्भया : रजनीश

फिर आ रहा है सोलह दिसंबर
फिर नुमाइश की तैयारियां हो रही हैं
फिर सुनाये जायेंगे मर्दानगी के किस्से
फिर किया जायेगा निर्भया से बलात्कार
अभी अभी तो सोई थी
फिर कच्ची नींद से उठ जायेगी निर्भया
फिर बुरा स्वप्न दोहराएगी निर्भया
फिर चीखेगी चिल्लाएगी निर्भया
फिर चुप हो जायेगी निर्भया
सुनो सुनो उसकी सर्द पड़ती चीख को
जो अब तक गूंजती है फ़िज़ा में
सुनो वो पूछती है किसने दिया उसे ये नाम?किसने?
पूछती है हमसे किसने कहा उसे निर्भया
वो जानती है हम उसे नहीं दे सकते
निर्भय जीवन वो जानती है
हम दे सकते हैं तो सिर्फ नाम सिर्फ नाम
देखो देखो उसकी डरी डरी आँखें
अब तक हमारा पीछा करती हैं
देख रही हैं निर्भया हमारी उँगलियों को
जो रंगी है उसके खुन से
मैं ही हूँ बलात्कारी
तुम भी हो हम सब हैं
हम में ही है मुकेश
विनय, पवन, राम सिंह
जो नहीं, तो फिर कौन है?
कौन है उसका बलात्कारी
कहाँ से आते हैं?कहाँ रहते हैं?
इनमें से कोई पूजा कोई आकांक्षा
आये दिन बनती है निर्भया
और हम में से किसी को हमदर्दी नहीं
हम सब झूठे हैं, सब के सब
बस एक को हमदर्दी है
निर्भया को
इस निर्भया के लिये
वो निर्भया रो रही है

रजनीश कुमार

2 comments

  • बहुत खूबसूरत रचना है। सच को बयां करती हुई।

    • परिवेश

      हमारी कोशिश है कि ऐसे रचनाकार आगे आएं उन्हें मंच दिया जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *