नज़्म: “इलाहाबाद”- डॉ०आलोक श्रीवास्तव

इलाहाबाद

मेरी यादों में है इलाहाबाद !
वो मेरा गाँव, मेरा नगर, मेरा शहर भी है
वो मेरा काफ़िया, रदीफ़ और बहर भी है
जो मेरी ज़िंदगी में पहला प्यार रह आया
वो गंगा-जमुना के उस प्यार की लहर भी है
वो मेरे तंग दिनों में भी रहा ज़िंदादिल
जो मेरी मुश्किलों पे टूटता वो कहर भी है
मैं उसी को कहा करता हूँ रोज़ ज़िंदाबाद ! मेरी यादों में…

मेरी समूची ज़िंदगी की वह कचहरी है
छाँव है, धूप है, मग़रिब है वह दुपहरी है
मेरे अब तक बचे होने की वजह एक वही
लिखने पढ़ने, खड़े होने की वजह एक वही
जियूँ कहीं भी, मगर मरने की जहां पे मुराद
बस वही शिवकुटी, फाफामऊ, रसूलाबाद ! मेरी यादों में…

यहीं मुझको मिले थे तूलिका औ’ मृत्युंजय
दुर्गा सर शून्य में कुछ ताकते जैसे संजय
और सचमुच बता देते वो कोई गहरी बात
दिल्ली से छूट कर आते थे जब इलाहाबाद। मेरी यादों में…

यहीं देखा किसी ने कोई तोड़ती पत्थर
यहीं सुलझाए गए थे किसी के तिमिर केश
यहीं लिखा गया बिल्लेसुर महाराज का दर्द
यहीं अतीत के चलचित्र की मिली सौगात
अब भी गाता है फक्कड़ी के तराने यारों
निराला का, महादेवी का वो इलाहाबाद ! मेरी यादों में…

नयी कहानी की उठी थी बात इसी जगह
इसी जगह से उठी थी नयी कविता की बात
किस तरह से मिला करती है डिप्टी कलक्टरी
रजुआ की ज़िंदगी का सच बताते अमरकांत
हर नयी बात को जगह दी अदब में जिसने –
शेखर जोशी, मार्कण्डेय का इलाहाबाद। मेरी यादों में…

गूँजती है गरज़ती सत्यप्रकाश सर की आवाज़
आज भी मन ही मन राजेंद्र सर पे मुझको नाज़
मेरे सपनों में अब भी आता है जो बार-बार
इलाहाबाद की युनिवर्सिटी का हिंदी विभाग
मुझे अफसोस है इस बात का यारों बेहद
क्यूं न कुछ और साल मैंने यां किए बर्बाद। मेरी यादों में…

चचा बमबाज यहीं पर कहीं रुक जाते हैं
सयान हँसते हैं और लौण्डे मुस्कियाते हैं
दोस्ती दुश्मनी दोनों ही एक साथ यहाँ
दोस्त मिलते हैं तो जी खोल के गरियाते हैं
बात कैसी भी कोई भी कभी कह सकता है
बकैतियों पे मुस्कुराता है इलाहाबाद। मेरी यादों में…

कहाँ जाबो, कहाँ चलबो, चलो बइठो में तुम
तुमका छोड़ित है निरंजन से सीधा खुल्दाबाद
देख लेबोगा में तुमहूँ हमार ठाठ बाट
जीका भौकाल है बस ऊका है इलाहाबाद ! मेरी यादों में…

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