गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ने वाले कवि थे विद्रोही

गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ने वाले कवि थे विद्रोही।
5/12/2017, इलाहाबाद, साहित्यिक मंच परिवेश की तरफ से कविता पाठ व व्याख्यान तथा “एक शाम विद्रोही के नाम” कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र पांडेय तथा हिंदी विभाग की डॉ० अलका ने भी अपनी रचना पढ़ी और तीन युवा कवियों को पुरष्कृत किया गया।

वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र पांडेय अपनी रचना का पाठ करते हुए

दानिश, रजनीश और कमलेश कुमार पुरष्कृत हुए।
जेएनयू से आये कवि आलोचक बृजेश यादव ने कविता और विद्रोही पर व्यक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि जो सामंतवाद, पूंजीवाद के चरित्र को समझ लेगा वो विद्रोही को समझ लेगा।

जो विद्रोही तेवर उनकी कविताओं में है वही तेवर उनके जीवन में भी था। वो सत्ता के झूठ से सीधे मुठभेड़ करने वाले कवि थे। वो जनता के बीच प्रतिरोध में शामिल व् जुलुस के साथ चलने वाले विद्रोही शख्सियत थे। जेएनयू का लोकतान्त्रिक माहौल उनको वहां पर रोके रहा। विद्रोही जी कहते थे की मेरी 300, 400 कवितायेँ हैं जिसे मैं जेएनयू समेत देश के कई विश्वविद्यालयों में जाकर सुनाता हूँ। वे आगे बोले कि फटेहाल फक्कड़ी अंदाज वाले विद्रोही ने अपने लिए कुछ संचय नहीं किया। जहाँ बड़े बड़े कवि निजी संपत्ति पर जड़ता बनाये रहे पर विद्रोही ने इस जड़ता को तोड़ा उन्होंने अपना जीवन गरीबों की गुलामी तोड़ने व् उनके बेहतर जिंदगी के लिए कविता में भी और बाहर भी संघर्ष किया। आतंक के भय से चुप रहने वाले कवि नहीं बल्कि उसके खिलाफ विद्रोह करने वाले कवि थे विद्रोही। आज समर्थन विरोध दोनों समस्या ग्रस्त है। इस तरह के भय का वातवरण है जिसमें फर्जी को ही प्रतिष्ठित होना है। उन्होंने कहा कि जो रोना नहीं गा पा रहे हैं वो गाना भी नहीं गा पाएंगे। उनकी कविताओं में नई खेती, मोहनजोदड़ो, औरतें, जन गण मन समकालीन कविताओं में बेहतर कवितायेँ हैं।

डॉ० अलका अपनी कविता पढ़ते हुए

अगले वक्ता जेएनयू के शोध छात्र विजय कुमार ने कहा कि अगर आप जेएनयू में एक हफ्ते गुजारते हैं तो आपका विद्रोही से मुठभेड़ होना तय है वे मुठभेड़ से ही नए छात्रों का स्वागत करते थे।

जेएनयू के अंदर छात्र प्रदर्शन में विद्रोही बतौर वक्ता शामिल होते। इस कवि की राजनितिक जीवंतता थी, विद्रोही उन प्रदर्शन में शामिल न होते तो उनका जीवन उस तरह चलता जैसा चल रहा था। हमारे समय के छात्रों के बीच अवतारवादी दर्शन को चैलेंज करने वाले कवि के रूप में स्वीकार किए जा चुके थे। विद्रोही जी जेएनयू या दिल्ली के प्रगतिशील जमात में जाड़े में धुप की तरह लगते थे। उन्होंने कहा कि जब वे कहते हैं कि मैं तुम्हारा कवि हूँ तब ये समझने की जरुरत है कि वे किसके लिए कहते हैं कि मैं तुम्हारा कवि हूँ। उनकी कविताओ में चरित्र आये हैं उनको ध्यान से देखने की जरुरत है। उनकी कविताओं में जो मुठभेड़ की स्थिति है वह समझने की जरुरत है। साथ ही उनकी कविताओं में मौजूद ऐतिहासिक समझ को भी रेखांकित करने की जरुरत है। विद्रोही उनके कवि हैं जो किसान के पक्ष में खड़े हों जो अवतार को चुनौती देते हों। इतने बड़े कवि को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में न रखना छात्रों को जीवंत कवि के बारे में जानने से उपेक्षित करना है। जितना विद्रोह उनकी कविता में है उतना ही विद्रोह उनके जीवन में भी था। कार्यक्रम का संचालन सौरभ सिंह ने किया।
व्याख्यान में हिंदी विभाग के प्रो० प्रणय कृष्ण, अतिथि प्रवक्ता अंशुमान और डॉ० अलका , रामजी राय, शोध छात्र ओबैद, विष्णु प्रभाकर, मनोरमा, प्रियंका शर्मा, नवनीत, अंकेश मद्धेशिया, बृजेश, शिवा जी, प्रदीप डीप समेत सैकड़ों छात्र उपस्थित थे।

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