स्टेट बैंक ने आपकी ग़रीबी पर ज़ुर्माना वसूला 1771 करोड़

स्टेट बैंक आफ इंडिया ने अप्रैल से नवंबर 2017 के बीच उन खातों से 1771 करोड़ कमा लिया है,जिनमें न्यूनमत बैलेंस नहीं था। यह डेटा वित्त मंत्रालय का है। न्यूनतम बैलेंस मेट्रो में 5000 और शहरी शाखाओं के लिए 3000 रखा गया है।

स्टैट बैंक आफ इंडिया ने जुलाई से सितंबर की तिमाही में 1581 करोड़ की वसूली की थी। यह पैसा बैंक की दूसरी तिमाही के मुनाफे से भी ज़्यादा है।

स्टेट बैंक के पास 42 करोड़ बचत खाताधारक हैं। इनमे से 13 करोड़ बेसिक बचत खाते और जनधन योजना के तहत खुले खातों से न्यूनतम बचत न होने का जुर्माना नहीं लिया गया। उन्हें मुक्त रखा गया।

29 करोड़ बचत खाताधारकों में ज़रूर ऐसे रहे होंगे जो अपने खाते में न्यूनतम बचत नहीं रख पाते होंगे, इसका संबंध उनकी आर्थिक स्थिति से ही होगा। इनके खाते से 100-50 काटते काटते बैंक ने 1771 करोड़ उड़ा लिए। अगर इनके पास पैसा होता तो क्यों ये कम रखते। ज़ाहिर है रखते ही।

मगर इस कमज़ोर आर्थिक स्थिति में भी बैंक ने उनसे जुर्माना वसूला। ये एक किस्म का चंपारण का तीन कठिया सिस्टम है जिसके तहत किसानों को अपने खेत के तीन हिस्से में नील की खेती करनी ही होती थी ताकि नील के मैनेजरों का मुनाफा और बढ़ सके।

स्टैट बैंक आफ इंडिया पर एनपीए का बोझ सबसे ज़्यादा है। बैंक की हालत खस्ता है। वह उन लोगों से जुर्माना नहीं वसूल नहीं पा रहा जो उसके लाख करोड़ से भी ज़्यादा लोन लेकर चंपत हो चुके हैं आपकी नासमझी का लाभ उठाकर इस देश में नौटंकी हो रही है।

एनपीए के बाद नोटबंदी ने बैंकों को भीतर से कमज़ोर कर दिया है। बैंक ने खुद को बचाने के लिए कमज़ोर लोगों की जेब काट ली। गला काट लिया। आप चुप रहिए। सिसकते रहिए और अपनी मेहनत कमाई से बैंक को 1771 करोड़ देते रहिए।

इंडियन एक्सप्रेस ने यह ख़बर छापी है। स्टेट बैंक की हिम्मत देखिए, जवाब तक नहीं दिया है। कर क्या लोगो, ख़बर छाप लो, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। यह संवेदनशीलता है उन बैंकों की जहां हम पैसे के साथ अपना भरोसा जमा करते हैं। सबको पता है कि टीवी आपको पाकिस्तान और तीन तलाक में उलझा कर रखे हुए हैं और इधर चुपके से आपकी जेब कतरी जा रही है।

हमने इस ख़बर के बाद एक हिन्दी अख़बार को चेक किया। उसके पहले पन्ने पर स्टेट बैंक की ख़बर थी। कि बैंक ने होम लोन पर ब्याज़ दर कम कर दिया है। गृह ऋण सस्ता हुआ। लेकिन आपका ही पैसा आपके खाते से कट गया, उसकी कोई ख़बर नहीं है। आपको अखबार गृह ऋण के जश्न में उलझा कर मूर्ख बना रहे हैं। अख़बार ख़रीदने से अख़बार पढ़ना नहीं आता है। पढ़ना सीखें। हिन्दी अख़बारों की चतुराई से सावधान रहिए।

पंजाब नेशनल बैंक ने भी इस ज़बरन वसूली से 97.34 करोड़ कमाए हैं। सेंट्रल बैंक ने 68.67 करोड़ और कैनरा बैंक ने 62.16 करोड़ कमाए हैं। पंजाब और सिंध बैंक ने इस तरह का जुर्माना नहीं लिया है। वह ऐसा करने वाला एकमात्र बैंक है।

खाते में कम पैसा होने का जुर्माना वसूला जा रहा है। आप नगद लेन देन न कर पाए इसके लिए जबरन रास्ते बंद किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जितना भी पैसा है, बैंक में रखिए। जब आप बैंक में रखते हैं तो कहा जाता है कि कम रखा है, चलो अब जुर्माना भरो। ज़्यादा रखेंगे तो ब्याज़ कम दिया जाएगा। आप देखिए कि आप अपनी आर्थिक स्वतंत्रता गंवा रहे हैं या पा रहे हैं? क्या ग़रीब होने का जुर्माना लगेगा अब इस देश में?

नोट: क्या आपको मेरा पोस्ट रोज़ मिलता है? कई मित्रों ने कहा है कि चार पांच दिनों तक कुछ आता ही नहीं है. फेसबुक एक साथ उन सभी तक मेरा पोस्ट नहीं पहुंचने देता है जो मुझे फोलो करते हैं। वो पैसे मांगता है। ये काम ठीक नहीं है। अगर आपको लगता है कि मेरे पोस्ट जनहित में हैं, तो इसे आगे बढ़ाएं। मैं अपने ब्लाग कस्बा पर भी लिखता हूं। उसका लिंक कमेंट में दे देता हूं। आगे बढ़ाते रहिए। शुक्रिया।

यूपी के सीएम योगी को सुनील मौर्या का खुला खत

खुला पत्र

प्रति,
मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश, भारत
विषय- विधिक राय के नाम पर UPSSSC आयोग के गठन का वादा न निभाने के विरोध स्वरुप.
महोदय,
आपको ज्ञात ही है कि उ.प्र.अधिनस्थ सेवा चयन आयोग का गठन अभी तक पूरा नहीं हो पाया. आपकी पूर्ण बहुमत की सरकार है और आप उसके मुखिया हैं. आपने स्वयं प्रदेश के सभी युवाओं से वादा किया था कि सरकार गठन के 90 दिन के अंदर सभी रिक्त पदों को भर दिया जायेगा और आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लग जायेगी तथा दोषियों को दण्डित किया जायेगा.
सरकार बनने के 10वें महीने में भी उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग, माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड व अधिनस्थ सेवा चयन आयोग का गठन तक अभी नहीं किया गया. यूपीएसएसएससी से जुड़े दर्जनों छात्रों ने आपकी पहली कैबिनेट मीटिंग के पूर्व जीपीओ, लखनऊ में प्रदर्शन किया. आपको मांगपत्र दिया गया और वार्ता हुई. उस दौरान आपने भ्रष्टाचार में लिप्त अध्यक्ष व सदस्यों के बजाय नये अध्यक्ष व सदस्य की नियुक्ति करके शीघ्र भर्ती प्रक्रिया शुरु करने का आश्वासन दिया. इसके बाद तो छात्रों ने अध्यक्ष व सदस्यों के इस्तीफे की मांग पर भी धरना दिया और वे लोग इस्तीफा भी दे दिये. इन सबके बावजूद अायोग का गठन नहीं हो सका, जिससे जूनियर असिस्टेंट का इंटरव्यू दे चुके छात्रों का अंतिम परिणाम, ग्राम पंचायत अधिकारी का अधूरा रह गया इंटरव्यू व कामर्शियल विभाग की भर्ती का इंतजार लंबा होता जा रहा है. बार- बार छात्रों के धरना प्रदर्शन के बावजूद छात्रों को आश्वासन से ज्यादा कुछ हाशिल नहीं हुआ. कुछ दिन पहले एक टी.वी. डिबेट के दौरान आपके प्रवक्ता मा. चंद्रमोहन जी व इलाहाबाद में रोजगार अधिकार आंदोलन के दौरान 26दिसंबर को एडीएम महोदय ने भी वादा किया था कि 31दिसंबर तक आयोग का गठन अवश्य हो जायेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.अब विधिक राय के नाम पर बहाना बनाया जा रहा है, जो ठीक नहीं है. 04जनवरी तक गठन नहीं हुआ तो छात्र 05जनवरी को प्रदर्शन के लिए बाध्य होंगे. जिसकी जिम्मेदार सरकार होगी. सरकार द्वारा दिये गये आश्वासनों व किये गये वादों को पूरा न करने से छात्रों में व्यापक आक्रोश व्याप्त हो गया है.
अत: आपसे अपील है कि शीघ्र आयोग का गठन करके बंद प्रक्रिया को तत्काल शुरु किया जाय. इसके पहले भी प्रदर्शन के दौरान आपकी पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज किया है. छात्र पुलिस की लाठी से डरने वाले नहीं है. छात्रों के भविष्य को अंधकार में ढकेलना बंद कीजिए अन्यथा हमारे भविष्य की बर्वादी, सरकार की भविष्य बर्वादी का कारण बन जायेंगी.
नफरत नहीं, रोजगार का अधिकार दो!
द्वारा जारी
सुनील मौर्य
प्रदेश सचिव, आइसा
08115766703

जब सावरकर ने चन्द्रशेखर आज़ाद से कहा- अंग्रेज़ों का साथ देकर मुसलमानों को मारो, 50 हज़ार देंगे

जब सावरकर ने चन्द्रशेखर आज़ाद से कहा- अंग्रेज़ों का साथ देकर मुसलमानों को मारो, 50 हज़ार देंगे

काकोरी ट्रेन डकैती और साण्डर्स की हत्या में शामिल निर्भय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को कौन नहीं जानता। जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए लड़ते लड़ते अपनी जान की कुर्बानी दे दी। बीते कल यानी यानी, 23 जुलाई को चंद्रशेखर आज़ाद की 111 वीं जयंती थी। आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेताओं में से एक रहें हैं।
चंद्रशेखर आजाद ने भारत के प्रमुख क्रांतिकारी, साम्राज्यवाद विरोधी संगठन, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) का नेतृत्व किया था। इससे पहले, जब संगठन को HRA कहा जाता था उस वक़्त राम प्रसाद बिस्मिल इसके मुखिया रहें थे।
चंद्रशेखर आजाद ने HRA की कमान उस वक़्त संभाली जब रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। बाद में सभी चारों को विभिन्न स्थानों पर फांसी दी गई थी। हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (HRA)की रीढ़ मानो टूट चुकी थी।
लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ, आजाद ने एक समाजवादी संगठन के रूप में पार्टी को पुनर्जीवित किया जो ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रतिबद्ध था।
लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए, आज़ाद और भगत ने योजना बनाई और लाहौर के ब्रिटिश अधिकारी सॉन्डर्स की हत्या को कामयाबी के साथ अंजाम दिया।
भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद, आजाद अपने साथियों के बचाव के लिए पैसे जुटा रहे थे। इस वाक़्या के सन्दर्भ में यशपाल ने अपनी आत्मकथा ‘सिंघवालोकन’ में लिखा है कि सावरकर 50,000 रुपये देने के लिए सहमत तो हो गए लेकिन इस शर्त पर कि आजाद और HSRA के क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लड़ना बंद करना होगा और जिन्ना और अन्य मुसलमानों की हत्या करनी होगी।
जब आज़ाद को सावरकर के प्रस्ताव के बारे में बताया गया तो उन्होंने इस पर सख्त आपत्ति ज़ाहिर करते हुए कहा, “यह हम लोगों को स्वतन्त्रा सेनानी नही भाड़े का हत्यारा समझता है। अंग्रेज़ों से मिला हुआ है। हमारी लड़ाई अंग्रेजो से है…मुसलमानो को हम क्यूं मारेंगे? मना कर दो… नही चाहिये इसका पैसा।
चन्द्रशेखर आजाद का बलिदान लोग आज भी भूले नहीं हैं। कई स्कूलों, कॉलेजों, रास्तों व सामाजिक संस्थाओं के नाम उन्हीं के नाम पर रखे गये हैं तथा भारत में कई फिल्में भी उनके नाम पर बनी हैं।

यह आलेख एस रंजन ने लिखा है

एक शख़्सियत जिसने मुझे कवि के साथ बेहतर इंसान भी बनाया : विष्णु नागर

मेरे लिए यह कहना मुश्किल है कि मैंने ‘दिनमान’ के संपादक रघुवीर सहाय को पहले जाना या उनके कवि रूप को। शायद उनके दोनों रूपों से परिचय लगभग एक साथ हुआ। मैं तब कॉलेज में पढ़ता था और पढ़ने- लिखने का शौक़ होने के कारण और पत्र-पत्रिकाओं के साथ ‘दिनमान’ भी नियमित रूप से पढ़ता था। सच कहूं कि ‘दिनमान‘ से जैसी बौद्धिक–संवेदनात्मक ख़ुराक मुझे तब मिलती थी, उस समय की किसी और पत्रिका से नहीं। उसे सबसे पहले पढ़ने के लिए मैं कॉलेज की लाइब्रेरी पहुंच जाता था और जब तक पढ़ नहीं लेता था, मुझे चैन नहीं आता था, हालांकि उसे पढ़कर भी चैन कहां आता था और जानने-समझने-संवेदित होने की बेचैनी और ज़्यादा बढ़ जाती थी। जब तक अज्ञेय और रघुवीर सहाय उसके संपादक रहे, तब तक के ‘दिनमान’ को मैं आज तक प्रकाशित सभी साप्ताहिकों में हिंदी का सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक मानता हूं, क्योंकि दृष्टि की वैसी व्यापकता, वैसा वैविध्य, विभिन्न कलाओं तथा ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के लिए जीवंत और अर्थमय भाषा गढ़ने का काम किसी और ने नहीं किया।




कला के विभिन्न अनुशासनों में अलग-अलग देशों-क्षत्रों में जो हो रहा है, चल रहा है, समाज की विभिन्न परतों पर क्या-क्या हो रहा है, इसकी पहली बार ठीक-ठीक ख़बर ‘दिनमान’ ने दी। बाद में यह परंपरा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकले अख़बारों और पत्रिकाओं ने नहीं निभाई।अब तो ज़्यादातर उल्टी ही प्रक्रिया चलती दिखती है। कॉलेज के उन्हीं वर्षों में मैंने अज्ञेय द्वारा संपादित रघुवीर जी की कविताओं-कहानियों आदि का संग्रह ‘सीढ़ियों पर धूप में’ पढ़ा था। मुझे उस संग्रह ने बहुत प्रभावित किया, हालांकि तब तक उनके दूसरे कविता संग्रह आत्महत्या के विरुद्ध की चारों तरफ़ बहुत चर्चा थी लेकिन मेरी राजनीतिक और सामाजिक समझ इतनी विकसित नहीं थी कि मैं उसकी ज़्यादातर कविताओं को समझ पाता।’सीढ़ियों पर धूप में’ संग्रह की कई कविताएं मुझे बहुत नई और बहुत अच्छी लगी थीं तब और आज भी लगती हैं। जैसे एक कविता है-अगर कहीं मैं तोता होता। यह कविता ऊपर से शब्दों का एक चमत्कारिक संपुंजन मात्र लगती है, अर्थहीन सी लगती है, रोचक खेल जैसी लगती है लेकिन इस कविता की बुनावट में कुछ ऐसा था कि यह इतनी पसंद आई थी कि रट गई थी। इसी तरह इसी संग्रह में एक और कविता थी-पढ़िए गीता। इसमें ऐसी अनेक श्रेष्ठ कविताएं हैं, किन-किन का यहां नाम लूं। बहरहाल उनके इस संग्रह का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा और और ‘दिनमान’ के संपादन का भी, इसलिए जब 1971 में मैं अचानक दिल्ली आ टपका- यहां जमने के इरादे से तो आते ही सबसे पहले मैं ‘दिनमान’ के दफ़्तर गया, जहां पहले प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से मिला और फिर उनकी सिफ़ारिश पर रघुवीर सहाय से। वह संपादक थे, एक अलग कमरे में बैठते थे, इसलिए मेरा साहस नहीं हो रहा था कि क़स्बे का एक छोकरा सीधे उनके पास फटकने की हिम्मत करे। जब मैं उनके पास गया तो समझिये मेरे पास पत्रकारिता का लगभग कोई अनुभव नहीं था।

यह लेख विष्णु नागर ने अमर उजाला में लिखा था।।

चरमराती अर्थव्यवस्था को चमकाने आ रहा राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का मसला

वित्तीय घाटे को लेकर बिजनेस अख़बार काफी चौकन्ने लगते हैं। आज भी बिजनेस स्टैंडर्ड ने इसे पहली ख़बर बनाया है। अरुप रॉयचौधरी और अभिषेक वाघमरे ने लिखा है कि सरकार ने 2017-18 के लिए वित्तीय घाटा का जो लक्ष्य रखा था वह बजट वर्ष के आठ महीने में ही ध्वस्त हो गया।

यानी पूरा साल बीत जाने के बाद आप वित्तीय घाटा 5.5 लाख करोड़ तक रखते लेकिन आठ महीने में यह घाटा इतने तक पहुंच गया। अब बाकी चार महीनों का जो वित्तीय घाटा होगा वो तो इससे अधिक ही होगा। वित्तीय घाटा की गिनती सरकार की राजस्व से कमाई और उसके ख़र्चे को घटाने के बाद की जाती है। अप्रैल से नवंबर के बीच यह अंतर 6 लाख 12 हज़ार करोड़ का हो चुका है जबकि लक्ष्य रखा गया था कि 5 लाख 50 हज़ार करोड़ ही होगा। इस दौरान सरकार ने राजस्व से 8 लाख 4 हज़ार करोड़ ही कमाए और ख़र्च किया 14 लाख 78 हज़ार करोड़।

अखबार का कहना है कि 2008-09 में जब वित्तीय संकट आया था, उसके बाद से यह अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन है। अप्रैल से नवंबर के दौरान इस साल का राजस्व वसूली का जो लक्ष्य था वह भी काफी दूर नज़र आता है। सरकार ने संसद में बताया है प्रत्यक्ष कर की वसूली का लक्ष्य 67 फीसदी पूरा हो चुका है। इससे कुछ उम्मीद की जा सकती है। 2016-17 में प्रत्यक्ष कर 15.32 प्रतिशत की दर से बढ़ा था उसकी तुलना में 2017-18 में 16.6 प्रतिशत बढ़ा है। ग़ौर से देखेंगे तो इतने हंगामे के बाद कोई ख़ास वृद्धि तो नहीं है।

अच्छी ख़बर ये है कि अदानी समूह की पूंजी(wealth) 2017 में 120 प्रतिशत बढ़ी है। ख़रबपतियों में सबसे अधिक वृद्धि अदानी ग्रुप ने ही हासिल की है। 3500 कंपनियों के डेटा का विश्लेषण बताता है कि 2017 में करोड़ की सैलरी पाने वाले सीईओ की संख्या में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ऊपर के लोगों की खूब तरक्की हो रही है। नीचे के लोगों का पता नहीं।

वैसे आज के ही बिजनेस स्टैंडर्ड में एक रिपोर्ट छपी है कि नोटबंदी के दौरान दिहाड़ी मज़दूरों और ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों का काम छिन गया। इस तरह की रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं। अगर चुनावी जीत है तो यह साबित होता है कि किसी का काम नहीं छिना और सबको नौकरी मिल गई।

शेखर गुप्ता ने लिखा है कि आने वाले महीनों में राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई जैसे भावुक मुद्दों की भरमार होने वाली है। 2019 के चुनाव में अर्थव्यवस्था के सवालों या उपलब्धियों को लेकर बात करने का मौका ही नहीं मिलेगा।

मेरी राय में ऐसा ही होना चाहिए। विचारधारा की आड़ में उठने वाले ये भावुक मुद्दे ही भारत के नौजवानों के लिए बौद्धिक सैलरी का काम करेंगे। बुज़ुर्गों के लिए बौद्धिक पेंशन का काम करेंगे।

बिटक्वाइन की तरह बौद्धिक सैलरी और बौद्धिक पेंशन का खोज करने वाला भारत दुनिया का पहला देश होगा। इन मसलों पर चर्चा करते हुए युवाओं की जवानी मौज में बीतेगी और बुज़ुर्गों का बुढ़ाना शानदार कटेगा। बचत भी कट ही रहा है धीरे धीरे। बाकी नौकरी और पैसे की क्या ज़रूरत है। अदानी जी के पास तो है ही। अदानी भी भारतीय हैं। जब ज़रूरत होगी, मांग लेंगे। तो अभ्यास मैच शुरू कीजिए। लाइये आज राष्ट्रवाद लाइये।


क्या 2जी मामले में सीबीआई ने बचाने का खेल खेला है? – रविश कुमार

क्या 2जी मामले में सीबीआई ने बचाने का खेल खेला है?

जज ओ पी सैनी के फैसले को ठीक से नहीं पढ़ा गया है। 1552 पन्नों के जजमेंट को पढ़ने पर पता चलता है कि क्या गेम हुआ है। 1544 नंबर पेज पर जो लिखा है, उसका हिन्दी अनुवाद पेश कर रहा हूँ। इस पैराग्राफ़ को पहले दिन से कोट किया जाता तो इस फैसले के बारे में तस्वीर और भी साफ होती। हैरान हूँ कि 2 जी फैसले में सब बरी हो गए मगर किसी ने भी ट्रोल नहीं किया। आई टी सेल के लोगों ने लालू के जेल जाने की तरह ट्रोल नहीं किया। आप इस पैराग्राफ़ को पढ़िए और देखिए कि किस बेशर्मी से लोगों को बचाया गया है। क्या 1 लाख 76 हज़ार करोड़ का आपस में बँटवारा कर लिया गया है ? नीचे का पैराग्राफ़ पढ़िए। जज ओ पी सैनी ने सीबीआई के ख़िलाफ़ क्या लिखा है।

” पता करना मुश्किल है कि अभियोजन पक्ष क्या साबित करना चाहता है। अंत तक आते आते अभियोजन पक्ष का स्तर पूरी तरह से गिरने लगा, दिशाहीन हो हई और बचने लगा। इसके बारे में बहुत लिखने की ज़रूरत नहीं क्योंकि जिस तरह से सबूतों को आगे बढ़ाया जा रहा था, उसी से बहुत सी बातें साफ हो जाती हैं। फिर भी अभियोजन पक्ष के बर्ताव के बारे में कुछ उदाहरण ही काफी हैं। अभियोजन की तरफ से कई तरह के जवाब और आवेदन फ़ाइल किया गया। बाद के चरणों में जब केस नतीजे की तरफ बढ़ रहा था तब कोई भी वरिष्ठ अधिकारी इन आवेदनों और जवाबों पर दस्तख़त करने के लिए तैयार नहीं था। उन पर कोर्ट में पदस्थापित जूनियर इंस्पेक्टर मनोज कुमार से साइन कराया गया। पूछने पर वरिष्ठ वकील का यही जवाब होता कि स्पेशल वकील( पीपी) साइन करेंगे और जब स्पेशल पब्लिक प्रोस्यूक्यूटर से पूछा जाता तो जवाब मिलता कि सीबीआई रे लोग साइन करेंगे। इससे पता चलता है कि न तो जाँच करने वाला और न ही अभियोजन पक्ष की तरफ से केस लड़ने वाला इस बात की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार था कि कोर्ट में क्या जवाब/ याचिका फ़ाइल की जा रही है।”

कबीर-नागार्जुन के बाद ‘विद्रोही’ जनकवि

‘आइसा’ के वे कॉमरेड थे और ‘कॉमरेड’ कहे जाने का उन्हें गर्व था. उनकी कविताएं न्याय के लिए जारी संघर्ष में शामिल थीं. वे नास्तिक थे. उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं. शिक्षित समुदाय को वाचिक काल-परंपरा से उन्होंने जोड़ा.

सत्ता-विरोधी कवि ही सच्चा जनकवि है. राजसत्ता, धर्मसत्ता, पितृसत्ता की प्रखर आलोचना जनसत्ता का आकांक्षी कवि ही कर सकता है. कवि-श्रेणी की एक कोटि अगर धन-कवि की हो सकती है, तो हमारे समय में किसी-न-किसी रूप में धन कवियों की संख्या बढ़ी है. रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ (3 दिसंबर, 1957- 8 दिसंबर, 2015) जन कवि थे. सामान्य जन ही उनका धन था. कहीं से ‘आधुनिक’ नहीं फक्कड़, मलंग, कवि थे वे. कविता उनके लिए खेती थी. कवि की संतान थी. बाप का सूद और मां की रोटी थी. वे संभवत: अकेले कवि थे, जिन्होेंने अपनी कविता में कवि को बचाने की बात कही़. कवि को बचाना कविता और जीवन को, किसान और मजदूर को, धरती और श्रम को बचाना है. ‘तुम वे सारे लोग मिल कर मुझे बचाओ/ जिसके खून के गारे से/ पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं/ क्योंकि मुझको बचाना उस औरत को बचाना है/ जिसकी लाश मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी पर पड़ी है. मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है, जिनकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी हैं. मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है. मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है/ तुम मुझे बचाओ/ मैं तुम्हारा कवि हूं.’


सुल्तानपुर जिला (उत्तर प्रदेश) के ऐरी फिरोजपुर गांव के रामनारायण यादव और श्रीमती करमा देवी की इस संतान ने बचपन में भैंस चरायी थी. मां करमा देवी गायिका भी थीं. गांव के स्कूल सरस्वती इंटर कॉलेज उमरी और राज डिग्री कॉलेज, बनवारीपुर से आरंभिक शिक्षा, इंटर-बीए करने के बाद उन्होंने वकालत की अधूरी पढ़ाई की. शिक्षित पत्नी से पढ़ने की प्रेरणा मिली. 1980 में वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय मे एमए हिंदी की पढ़ाई करने आये. 1983 के छात्र-आंदोलन में सक्रियता के कारण, 26 अप्रैल 1983 को छात्रों की भूख हड़ताल में शामिल होने के कारण 8 मई, 1983 को उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया. उनकी गिरफ्तारी का विरोध हुआ. 14 मई, 1983 को पुलिस और छात्रों के बीच संघर्ष हुआ. उस दिन लगभग 300 छात्र गिरफ्तार हुए, जेल गये. तीन दिन बाद ‘विद्रोही’ की पत्नी शांति देवी ने (दिल्ली विकास प्राधिकरण यानी डीडीए) में कार्यरत जमानत ली. विद्रोही की औपचारिक विश्वविद्यालयी शिक्षा प्रभावित हुई. उनका अंतिम सेमेस्टर था, पर उन्हें कक्षा करने की अनुमति नहीं थी. अपनी अधूरी शिक्षा और बहिष्कार के बाद भी उन्होंने विवि कैंपस नहीं छोड़ा. लगभग 31 वर्ष वे कैंपस में रहे. 2010 में उन्हें फिर कैंपस से निकाला गया. उन पर गंदी भाषा के प्रयोग का झूठा इल्जाम था. छात्रों में उनके प्रति अद्भुत प्यार था. 4 सितंबर, 2010 को कैंपस से उनको बाहर किये जाने के पूर्व आदेश को निरस्त किया गया. वे फिर कैंपस लौटे और अंत तक वहीं रहे.

‘विद्रोही’ कैंपस के कवि नहीं थे. वे छात्र-आंदोलन के साथ रहे. छठीं कक्षा (1967) से उनका कविता से लगाव और जुड़ाव था. 1967 में नक्सलबाड़ी के जन्म के साथ कविता में उनका प्रवेश हुआ. छात्र संगठन ‘आइसा’ के वे कॉमरेड थे और ‘कॉमरेड’ कहे जाने का उन्हें गर्व था. उनकी कविताएं न्याय के लिए जारी संघर्ष में शामिल थीं. वे नास्तिक थे. उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं. शिक्षित समुदाय को वाचिक काल-परंपरा से उन्होंने जोड़ा. मुद्रित साहित्य के ग्रहण और वाचिक कविता के ग्रहण में अंतर है. वाचिक परंपरा में समूह-समुदाय प्रमुख है. कविताएं श्रोताओं को सीधे संबोधित होती हैं. कवि-पाठक-श्रोता के बीच दूरी मिटती है. हिंदी कविता वाचिक-परंपरा से दूर जा चुकी हैं. विद्रोही ने उसे पुनर्जीवित किया. हिंदी-अवधी मिश्रित उनका काव्य संग्रह ‘नई खेती’ उनके काव्य प्रेमियों, मित्रों संगी-साथियों के कारण प्रकाशित हुआ. 150 पृष्ठों की यह किताब 2011 में सांस्कृतिक संकुल, जनसंस्कृति मंच, इलाहाबाद ने प्रकाशित की थी. विद्रोही की अनेक अप्रकाशित कविताएं हैं. अगले वर्ष उनके दूसरे कविता-संकलन के प्रकाशित होने की संभावना है. दिल्ली और बाहर के विश्वविद्यालयों में घूम-घूम कर उन्होंने अपनी कविताएं सुनायीं. अपने को नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरूदा और कबीर की परंपरा से वे जोड़ते थे. जेएनयू से वे सदैव जुड़े रहे. ‘जेएनयू मेरी कर्मस्थली है. मैंने यहां के हॉस्टलों में, पहाड़ियों और जंगलों में अपने दिन गुजारे हैं.’ तीन दशकों से वे जेएनयू के अघोषित नागरिक थे. सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक वे कैंपस में लाइब्रेरी और फिर गंगा ढाबेे पर देखे जा सकते थे. नवारूण भट्टाचार्य जेएनयू में उनसे गले मिले थे. उनकी लोकप्रियता उनकी क्रांतिकारिता से जुड़ी थी. वे सदैव युवाओं के साथ रहे, क्योंकि क्रांति में युवाओं की ही मुख्य भूमिका है. अपनी एक कविता में उन्हाेंने लिखा है कि न तो चे ग्वेवारा मरे हैं और न चंद्रशेखर. ‘मोहनजोदड़ो’ कविता में कविता के लिखने से आग भड़कने की बात कही गयी है. इस कविता में ‘विद्रोही’ ने पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाआें के लोगों से ‘आग से बचाने’ की बात कही है. जो आग लगायी जा रही है- शताब्दियों- सहस्त्राब्दियों से, उससे बचाना जीवन को बचाना है.
नई खेती, औरतें, मोहनजोदड़ो, जन-गण-मन, दुनिया मेरी भैंस, नूर मियां, धरम तुम्हारा भगवान, पुरखे, कथा देश की, कवि, कविता और लाठी आदि उनकी प्रमुख कविताएं हैं. अवधी में इह वइ धरतिया हमार महतरिया, मां, सिरता जी मइया आदि कविताएं प्रमुख हैं. विद्रोही की तर्क-दृष्टि, इतिहास दृष्टि उनकी कविताओं में मौजूद है. अगर जमीन पर भगवान जम सकता है, तो आसमान में धान भी जम सकता है. उनकी कविता का व्याकरण समाज के व्याकरण से जुड़ा है. पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें/ फिर भारत भाग्य-विधाता मरें/ फिर साधू के काका मरें/ यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें/ फिर मैं मरूं- आराम से. अवधी कविता ‘ई कलिजुगहा मजूर पूरी सीर मांगत’ अप्रतिम है. उनकी कविता का समाज-संसार हिंदी के कई प्रतिष्ठित सम्मानित, पुरस्कृत कवियाें के समाज-संसार से भिन्न है. वे बदलाव, परिवर्तन, संघर्ष, प्रतिरोध और एक अर्थ में क्रांति के कवि थे.
नितिन के पमनानी और इमरान द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंटरी फिल्म ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ (42 मिनट की) उन पर केंद्रित है, जिसे मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वोत्तम डॉक्यूमेंटरी फिल्म अवार्ड मिला है. उनकी कविताओं और इस फिल्म से उनके महत्व को जाना जा सकता है. एक्टिविस्ट कवियों की एक समृद्ध विश्व विरासत है. विद्रोही एक सांस में मोहनजोद.डो से लेकर आज के भारत की यात्रा करते हैं. वे उस ‘नयी दुनिया’ के कवि थे, जहां आदमी आदमी की तरह रह सके.

रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार

इंक़लाब के घर वालों ने साहित्य अकादमी लेने से किया इनकार

मशहूर तमिल कवि इंकलाब के परिवार ने साहित्य अकादमी अवार्ड लेने से मना कर दिया है। उन्हें यह सम्मान मरणोपरांत देने की घोषणा गुरुवार को की गई थी। उनकी फैमिली का कहना है कि इंकलाब एक ऐसी सरकार से कभी कोई सम्मान नहीं लेते, जो सांप्रदायिक और जातिवादी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है। बता दें कि पिछले साल 72 साल की उम्र में इंकलाब की मृत्यु हो गई थी।

द हिंदू अखबार के मुताबिक, वह मार्क्सवादी-लेनिनवादी थे और खुद के तमिल होने पर गर्व करते थे। वह कथित तौर पर वानमपड़ी नामक कविता आंदोलन से भी जुड़े थे। वह चेन्नई के न्यू कॉलेज में तमिल प्रोफेसर के तौर पर भी काम कर चुके थे। इंकलाब के साथ काम कर चुकी और उनके नाटकों का निर्देशन करने वालीं थिएटर कलाकार मनगई का कहना है कि जब वह जीवित थे, तब यह सम्मान उन्हें दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि तब वह इसे स्वीकार करते या लौटा देते, यह अलग बात होती। लेकिन हम जानते हैं कि कई बार अवार्ड के लिए उनके नाम पर विचार किया गया। लेकिन उनका नाम सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गया कि वह लोगों के साथ खड़े रहते थे और अपनी रचनाओं में उनकी आवाज उठाते थे।

इंकलाब ट्रस्ट संभालने वाली उनकी बेटी अमीना का कहना है कि मेरे पिता कहा करते थे कि अपनी रचनाओं के लिए अवार्ड पाने की चाहत उन्होंने कभी नहीं की। इसकी जगह उन्हें आलोचना और आरोप ही झेलने पड़े।

आउटलुक से साभार

टोबा टेक सिंह: जहां आज भी बसती है सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत

भारत में हम टोबा टेक सिंह को महान कहानीकार सआदत हसन मंटो के मार्फ़त जानते हैं. ‘टोबा टेक सिंह’ विभाजन पर मंटो की सबसे प्रसिद्ध और त्रासद कहानियों में से एक है.
इस कहानी में पागलखाने के हिंदू और सिख मरीज़ों को लाहौर से भारत भेजे जाने के विषय को उठाया गया है.

इस कहानी ने समझदारी की परिभाषा और ‘पागल’ और अक़्लमंद दुनिया के बीच की सीमा के लगातार और झीने होते जाने को लेकर कुछ बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे. आज मंटो के जन्मदिन (11 मई) पर हम टोबा टेक सिंह के बारे में आपको बता रहे हैं.

टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में जगह का नाम है. कहानी का मुख्य पात्र इसी जगह का है. बिशन सिंह, टोबा टेक सिंह में ही रहना चाहता था, लेकिन एक दिन वह अचानक पाता है कि उसे बस इसलिए भारत भेजा जा रहा है, क्योंकि वह सिख है.

टोबा टेक सिंह रेलवे स्टेशन

इस आघात को सह पाना उसके लिए बेहद मुश्किल साबित होता है और भारत और पाकिस्तान के बीच नो-मैंस लैंड में ही उसकी मौत हो जाती है. किसी भी ‘समझदार’ व्यक्ति के लिए यह कहानी परेशान करने वाली है.

हालांकि यह कहानी और इसके पात्र काल्पनिक थे, मगर इस जगह का अस्तित्व आज भी कायम है.

टोबा टेक सिंह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का एक शहर और तहसील (ज़िला) है. टोबा टेक सिंह का इतिहास टेक सिंह नाम के एक व्यक्ति से जुड़ा हुआ बताया जाता है, जिसका काम इस क्षेत्र में आने वाले यात्रियों की मदद करना था.

चूंकि यह जगह कई रास्तों के संगम पर स्थित था, इसलिए यहां यात्रियों और राहगुजरों का आना-जाना लगा रहता था. टेक सिंह इन्हें पास के एक तालाब से गरहा मटके में पानी लाकर पिलाया करता था.

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टोबा टेक सिंह का तालाब. (फोटो: उमैर अहमद)
यह गरहा मटका उर्दू में टोबा कहलाता है. इस वजह से समय के साथ यह इस स्थान की पहचान बन गया और इसका नाम टोबा टेक सिंह पड़ गया.

यह जगह भी विभाजन की क्रूरता से अछूता नहीं रहा. विभाजन के खरोंच इस जगह पर भी लगे. एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन होने के नाते टोबा टेक सिंह न केवल हिंसा का साक्षी बना, बल्कि इसने शवों से लदी हुई ट्रेनें भी देखी हैं.

आज़ादी के बाद इस जगह का नाम बदलने की कई कोशिशें हुई हैं. यहां रहने वाले अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता उमैर अहमद बताते हैं, ‘कट्टरपंथियों ने कई बार इस जगह का नाम बदलने की कोशिश की है. उन्होंने इस जगह का नाम ‘दर-उल-इस्लाम’ करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन टोबा के लोगों ने इसका विरोध किया और इस जगह की विरासत को किसी तरह बचाया.’

यहां के रहने वाले भी इस जगह की विरासत को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं. इस जगह की आत्मा सांप्रदायिक सद्भाव, एकता और शांति में बसती है. अहमद कई शांति और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े हैं. आग़ाज़-ए-दोस्ती, नामक भारत-पाक पहल इनमें में से एक है.

टोबा टेक सिंह के कोऑर्डिनेटर के तौर पर वे हर साल शहर में एक शांति कैलेंडर भी जारी करते हैं. इस कैलेंडर को भारत और पाकिस्तान के स्कूलों के छात्र मिलकर बनाते हैं.

Manto Toba Tek Singh
सआदत हसन मंटो. (11 मई 1912 – 18 जनवरी 1955)
अहमद टोबा टेक सिंह के स्कूलों में पेंटिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं और एक आयोजन में यह कैलेंडर जारी करते हैं.

यह आयोजन न केवल शांति को बढ़ावा देता है, बल्कि विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव को भी प्रोत्साहित करने की कोशिश करता है.

इस मकसद से इस आयोजन में विभिन्न धर्मों से जुड़े वक्ताओं को बोलने के लिए आमंत्रित किया पाता है.

टोबा टेक सिंह का सुंदर इतिहास, यहां के निवासियों के लिए गर्व का विषय है. यहां के लोगों ने न सिर्फ इस इतिहास को विरासत में हासिल किया है, बल्कि इसे बचाने के लिए वे संघर्ष भी कर रहे हैं.

उनका संघर्ष उम्मीद की किरण की तरह है. हम इतिहास को बदल नहीं सकते. बंटवारे का जख़्म कई रूपों में जिंदा है, मगर निश्चित तौर पर हम इस इतिहास की भरपाई अमन और भाईचारे के बीज बोकर कर सकते हैं.

The wire hindi से साभार

उर्दू में शपथ पर एफ़आईआर ! तो क्या दूसरी राजभाषा का दर्जा छिनेगा यूपी में !

अलीगढ़ में एक नवनिर्वाचित बीएसपी पार्षद के ख़िलाफ़ इसलिए एफआईआर कराई गई है कि उन्होंने उर्दू में शपथ ली है।

शपथग्रहण के दौरान बीएसपी पार्षद मुशर्रफ हुसैन उर्दू में ही शपथ लेने के लिए अड़े हुए थे जबकि बीजेपी पार्षद इसे हिंदी का अपमान बताते हुए हंगामा कर रहे थे। आरोप है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उनकी पिटाई कर दी। हुसैन ने जान से मारने की साज़िश करने का आरोप लगाया है।

इस सिलसिले में छपी अख़बारों में भी इस बात को ख़ास तवज्जो नही दी गई कि उर्दू उत्तरप्रदेश की राजभाषा है और उर्दू में शपथ लेना किसी का संवैधानिक अधिकार है। मोदी और योगी कालीन बीजेपी में शायद इन चीज़ों का कोई मतलब नहीं रह गया है। सामने मुस्लिम खड़ा हो तो उसे शैतान साबित करने के लिए किसी भी तर्क का प्रयोग किया जा सकता है।

मुहब्बत और इन्क़लाब की ज़बान कही जाने वाली उर्दू से ये नफ़रत कोई नई नहीं है। उर्दू को 1982 में ही उत्तर प्रदेश की दूसरी राजभाषा घोषित किया गया था लेकिन इसके ख़िलाफ़ जमकर ताल ठोंकी गई। उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने इसकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी। आख़िरकार 2014 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने उर्दू को दूसरी राजभाषा को दर्जा देने वाले क़ानून को वैध ठहरा कर मामले को ख़त्म किया। 4 सितंबर, 2014 को मुख्य न्यायाधीश आर.एम.लोढ़ा, न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति मदन बी.लोकुर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ़ और न्यायमूर्ति एस.ए.बोबडे ने राजभाषा से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 345 और 347 की व्याख्या करते हुए यह फ़ैसला किया कि उर्दू को दूसरी राजभाषा घोषित किया जाना संवैधानिक था।

उत्तरप्रदेश सरकार ने पहले 7 अप्रैल 1982 को एक अध्यादेश जारी करके और फिर उत्तर प्रदेश शासकीय भाषा संशोधन अधिनियम, 1989 द्वारा उत्तर प्रदेश के शासकीय कार्यों के लिए उर्दू को दूसरी राजभाषा घोषित किया था। लेकिन उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने अध्यादेश और अधिनियम दोनों को इस आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायलय में चुनौती दी कि राज्य में हिंदी राजभाषा के रूप में 1951 से ही मान्यता प्राप्त है। इसलिए उर्दू को दूसरी राजभाषा घोषित नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 16 अगस्त 1996 को साहित्य सम्मेलन की यह याचिका निरस्त कर दी थी, जिसके ख़िलाफ़ 1997 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक खंडपीठ (दो-सदस्यीय पीठ) ने मामला पूर्णपीठ को सौंप दिया और बाद में पूर्णपीठ (तीन-सदस्यीय पीठ) ने भी मामले को 29 अक्टूबर, 2003 को संविधान पीठ को भेज दिया।

संविधान पीठ ने निर्णय दिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार का अधिनियम संविधान की मंशा (आशय) के अनुरूप है और वैध तथा संविधानिक है। संविधान में (अनुच्छेद 345) ऐसा कुछ नहीं है जो राज्य में हिंदी के अतिरिक्त एक या अधिक भाषा को शासकीय भाषा के रूप में प्रयोग किए जाने की घोषणा करने से रोकता हो।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में यह भी कहा गया कि देश के अनेक राज्यों जैसे- बिहार, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड ने राज्य में हिंदी के अतिरिक्त अन्य स्थानीय भाषाओं, जो आम जनता के द्वारा अधिक प्रयोग की जाती हैं, को शासकीय भाषा के रूप में मान्यता दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 345 में प्रयोग की गई शब्दावली ‘‘उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को ‘या हिंदी को ’ का तात्पर्य यह नहीं है कि ‘हिंदी’ को ‘राजभाषा’ घोषित करने के बाद किसी अन्य भाषा को ‘राजभाषा’ घोषित नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि ‘हिंदी’ को ‘राजभाषा’ घोषित किए जाने के बाद भी राज्य का विधानमंडल उस राज्य में प्रयोग होने वाली अन्य भाषाओं में से एक या अधिक को राजभाषा घोषित कर सकता है।

लेकिन उर्दू का नाम आते ही भगवा पार्टी के लोगों को पता नही क्यों परेशानी होती है। उन्हें ये भी नहीं पता कि उर्दू लफ़्जों के बिना वे एक वाक्य भी उस भाषा का नहीं बोलते हैं जिसे वे शुद्ध हिंदी समझते हैं।

उर्दू को पिछले दिनों तेलंगाना में भी दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया । दिल्ली जैसे राज्य में तो पंजाबी और उर्दू दोनों को दूसरी राजभाषा का दर्जा हासिल है। यानी सरकारी कामकाज हिंदी के अलावा इन भाषाओं में भी हो सकता है।

बहरहला, अलीगढ़ की घटना सामान्य नहीं है, इसके निहितार्थ बहुत स्पष्ट हैं। ऐसा लगता है कि तमाम विभाजनकारी मुद्दों के अलावा सांप्रदायिक शक्तियों के तरकश में उर्दू विरोध का तीर अब भी पड़ा है और वे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद उर्दू को बरदाश्त करने को तैयार नहीं हैं।

वैसे बीजेपी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में भीषण बहुमत है। तीन सौ से ज़्यादा विधायकों के रहते उर्दू को दूसरी राजभाषा की हैसियत से गिराने की कोशिश करना बहुत मुश्किल भी नहीं है। योगी आदित्यनाथ अगर मुख्यमंत्री हैं तो ऐसे क़दमों की आशंका से इनकार भी नहीं करना चाहिए।

मीडिया विजिल से साभार

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