8 जनवरी को होगा महासम्मेलन, आयोगों को बहाल करो बना नारा

उत्तर प्रदेश के समस्त प्रतियोगी छात्र छात्राओं को सूचित किया जाता है कि आगामी 8 जनवरी यानी कल सुबह 11:00 बजे बालसन चौराहे पर गांधी प्रतिमा के सामने एक महासम्मेलन का आयोजन किया गया है यह महासम्मेलन का आयोजन उत्तर प्रदेश में समस्त बंद पड़े आयोगों की बहाली के लिए किया जा रहा है माध्यमिक सेवा चयन आयोग उच्चतर सेवा चयन आयोग अधीनस्थ सेवा चयन आयोग जैसे आयोगों की बहाली कराने के लिए कई संगठनों का समर्थन प्राप्त है युवा मंच स्वराज अभियान आयशा सहित इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पदाधिकारी और BHU वाराणसी जेएनयू सहित कई विश्वविद्यालय के छात्रसंघ संगठनों ने अपना समर्थन प्रदान किया है जिस में अहम योगदान इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा प्राप्त है उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के द्वारा बार-बार वादाखिलाफी की जा रही है जिससे युवा त्रस्त आ चुके हैं प्रधानमंत्री के 90 दिन के वादे को उत्तर प्रदेश सरकार भूल चुकी है उसी को ध्यान में लाने के लिए और समस्त आयोगों को बाहर करने के लिए भर्ती प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए युवा मंच के अध्यक्ष अनिल सिंह B.ED उत्थान जन मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष संगीता पाल स्वराज अभियान से कार्यकारिणी सदस्य राजेश सचान आयशा के अध्यक्ष शक्ति रजवार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता जावेद अली और इलाहाबाद विश्वविद्यालय सीएमपी डिग्री कॉलेज ईश्वर सरन डिग्री कॉलेज इलाहाबाद डिग्री कॉलेज सहित कई डिग्री कॉलेजों के छात्रसंघ अध्यक्षों का समर्थन प्राप्त है इस माह आंदोलन का केंद्र इलाहाबाद बनाया गया है क्योंकि इसमें पूरे विश्व की निगाहें इलाहाबाद पर है इलाहाबाद में माघ मेला चल रहा है जो विश्व की धरोहर के रूप में दर्जा प्राप्त है और उधर फूलपुर लोकसभा का चुनाव भी चरम पर है जिसको देखते हुए महान दोलन का केंद्र इलाहाबाद स्थापित किया गया है इलाहाबाद के समस्त प्रतियोगी छात्र छात्राओं से निवेदन है कि कल सुबह 11:00 बजे यानी 8 जनवरी को बालसन चौराहा गांधी प्रतिमा के सामने पहुंचकर महा आंदोलन को सफल बनाने के लिए अपनी पुरजोर कोशिश करें जिससे युवाओं का भविष्य एक सही दिशा में जा सके मैं आप लोगों से निवेदन कर रहा हूं और इस माह आंदोलन में मैं समस्त गैर राजनीतिक संगठनों को समस्त गैर राजनीतिक पार्टियों को भी आमंत्रित करता हूं।
द्वारा जारी
डॉ० चंद्रेश कुमार यादव
प्रदेश संयोजक
B.Ed उत्थान जनमोर्चा उत्तर प्रदेश

सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय, अग्रेसर, अमेठी, उत्तर प्रदेश का उद्घाटन समारोह सम्पन्न

3 जनवरी 2018 की सर्द सुबह देश के विभिन्न हिस्सों से जुटे साहित्यकार, लेखक, बुद्धिजीवी, शिक्षक सुल्तानपुर से लगे रामगंज बाजार के पास स्थित गाँव अग्रेसर में सावित्रीबाई फुले के जन्म दिन के अवसर पर ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ के उद्घाटन के साक्षी बने । पुस्तकालय का उद्घाटन प्रेमचंद, रेणु और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा के वाहक और वारिस, ग्रामीण जीवन के यथार्थ के सजग चितेरे कथाकार शिवमूर्ति ने किया । इस पुस्तकालय का निर्माण इसी गावं में रहने वाली युवा लेखिका और शिक्षिका ममता सिंह ने अपने मित्रों, परिवार और स्थानीय लोगों की सहायता से किया है और वही इसका संयोजन, संचालन करेंगी ।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने अपने बचपन की यादें साझा कीं । उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें अपने बचपन में एक मित्र के यहाँ किताबें पढ़ने को मिलती थीं, जिससे उनके भीतर पढ़ने की जिज्ञासा और लालसा पैदा हुई । शिवमूर्ति जी ने कहा कि जिस प्रकार हमारे पारिवारिक वारिस होते हैं ठीक उसी प्रकार हमारे लेखकीय साहित्यिक वारिस भी होते हैं । अगर मैं कहानीकार के रूप में अपने को प्रेमचंद, रेणु और संजीव का वारिस मानूं तो ममता के रूप में हमें हमारा साहित्यिक वारिस मिल गया है जो हमारे लिए बहुत गौरव की बात है । सावित्रीबाई फुले के स्त्री शिक्षा और समाज में दिए योगदान को याद करते हुए शिवमूर्ति ने बताया कि जब सावित्रीबाई ने स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने का निर्णय लिया तो लोगों ने उन्हें अनेक प्रकार से तंग किया, विद्यालय जाते समय उनके ऊपर छतों पर से कूड़ा फेंका जाता था, किंतु वे अपने संकल्प पर अडिग रहीं और भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में जानी गईं ।

शिवमूर्ति जी ने पुस्तकालय को आधुनिक और डिजिटल बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया ।
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रामदेव शुक्ल ने बेबी हालदार की कहानी के ज़रिए बताया कि पढ़ने और लिखने के अवसर मनुष्य को किस तरह बदल देते हैं । घरों में चौका बर्तन करने वाली  एक स्त्री को  लिखने पढ़ने का अवसर मिला और आज वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति की लेखिका हैं । ‘आलो आंधारि’ उनकी चर्चित पुस्तक है | उनके बच्चे बहुत गर्व से कहते हैं कि उनकी माँ ऑथर हैं । 
दिल्ली से आईं लेखिका और शिक्षिका मृदुला शुक्ल ने आज के समाज में स्त्रियों की भयानक दुर्दशा और शोषण के ज़रिए सावित्री बाई फुले के संघर्षों के महत्व को याद किया । आज आधुनिक कहा जाने वाला हमारा समाज स्त्रियों को एक खास तरह की सामंती और पितृसत्तात्मक सोच के दायरे से बाहर निकल कर नहीं देख पाता तो डेढ़ सौ साल पहले के हमारे रूढ़िवादी समाज में स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने और स्त्री शिक्षा के लिए काम करने का निर्णय कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है । मृदुला जी ने सावित्रीबाई फुले को इस रूप में भी याद किया कि वे न होतीं तो शायद हमारी स्त्रियों को इस तरह के पढ़ने के मौके न मिल पाते । 
पहले सत्र की अध्यक्षता युग तेवर पत्रिका के संपादक श्री कमल नयन पाण्डेय ने की । कमल नयन जी ने अपने वक्तव्य में बच्चों, स्त्रियों, युवाओं, किसानों, कामकाजी महिलाओं सभी के लिए पुस्तकें रखने का सुझाव दिया | संचालन पुस्तकालय के सह संयोजक गीतेश ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय की संयोजक ममता सिंह ने किया । अनेक शुभचिंतकों प्रो. राजेन्द्र कुमार, मीना राय, अनीस सिद्दीकी साहब आदि ने पुस्तकालय के लिए पुस्तकें भेंट की तथा शिवमूर्ति जी ने भविष्य में महत्वपूर्ण पुस्तकों, पत्रिकाओं के रूप में पुस्तकालय का सहयोग करते रहने का आश्वासन दिया | इस अवसर पर बड़ी संख्या में बच्चे, युवा, स्त्रियाँ तथा स्थानीय ग्रामवासी मौजूद रहे |

पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान :

फुले का संघर्ष सामाजिक बदलाव का आन्दोलन था : डॉ. रामायन राम

इस मौके पर ललितपुर से आए युवा आलोचक और जन संस्कृति मंच उ.प्र. के राज्य सचिव डॉ. रामायन राम ने पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान दिया । अपने सजग और चेतना से लैस वक्तव्य में रामायन जी ने न सिर्फ सावित्रीबाई के स्त्री शिक्षा में योगदान को याद किया बल्कि हमारे समाज के लिए सावित्रीबाई के संपूर्ण योगदान को रेखांकित किया । सावित्रीबाई फुले जब स्त्री शिक्षा के लिए निकलीं तो उनका विरोध सिर्फ रूढ़ विचार से ही नहीं बल्कि शारीरिक हमलों के द्वारा भी किया गया । सावित्री बाई फुले ने पूना में विधवा गर्भवती स्त्रियों की प्रसूति के लिए आश्रम का निर्माण कराया तथा अपने जीवन काल में लगभग पाँच हजार ऐसी स्त्रियों को प्रसूति का अवसर उपलब्ध कराया । उन्होंने पूना में नाइयों की एक ऐतिहासिक हड़ताल कराई जिसमें शहर के नाइयों ने विधवा स्त्रियों का मुंडन करने से इन्कार कर दिया ।
रामायन जी ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हमारे समाज के वे तत्व जो जाति के भेदभाव और शोषण को और सघन बनाना चाहते थे वे जानते थे कि सामंतवाद और स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण उनका प्रमुख हथियार होगा । यही कारण है कि सावित्रीबाई के प्रयासों का इतना भयंकर विरोध हुआ ।
 कोरेगांव में दलितों पर हुए ताजा हमले को याद करते हुए रामायन ने कहा कि आज की सामंती और साम्प्रदायिक ताकतें नया इतिहास गढ़ने का काम कर रही हैं और इसमें सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत का जहर फैलाया जा रहा है जिसके प्रतिरोध के लिए हमें किताबों की दुनिया में जाना होगा । यह पुस्तकालय इस लिहाज़ से भी एक महत्त्वपूर्ण पहल है ।
अंत में रामायन राम ने सावित्रीबाई फुले की मौत को भी एक महान और प्रेरक मौत की तरह याद किया । उन्होंने बताया कि जब जब पूना में प्लेग की महामारी फैली थी तो प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए वे बीमार हुईं जो उनकी मौत का सबब बना, किंतु वे अपने अंतिम समय तक रोगियों की सेवा में लगी रहीं । सावित्रीबाई फुले का अभियान केवल शिक्षा के लिए नहीं था | वह भारतीय समाज के नवनिर्माण का आन्दोलन था | शिक्षा से शुरू करके उन्होंने स्त्री मुक्ति तक का सफर तय किया जो जाति उन्मूलन की लड़ाई से जुड़ा, जिसे बाद में अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के जरिए उठाया | लोकतंत्र,समता,बराबरी अचानक से नहीं आते हैं | वे समाज के भीतर के आतंरिक संघर्षों और विचार को लेकर लोगों के संघर्ष से आता है | भारतीय समाज एक जटिल समाज है, इसमें आधुनिकता के एक-एक कदम के लिए संघर्ष करना पड़ा है | सावित्री बाई फुले ने ऐसे ही समाज के भीतर स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्वास के लिए संघर्ष किया | यह सिर्फ स्त्री शिक्षा के लिए चलने वाला आन्दोलन नहीं था बल्कि समाज को भीतर से बदलने वाला, उसे जड़ से हिलाने वाला आन्दोलन/अभियान था | सावित्री बाई फुले के इस आन्दोलन को आज फिर से नए सिरे से शुरू करने का समय है जिसका एक रूप यह पुस्तकालय है |
सावित्रीबाई के नाम पर आयोजित यह व्याख्यान वार्षिक रूप में उनके जन्म दिन पर मनाने की योजना है ।

हिंदी की साहित्यिक पत्रिका कथा का लोकार्पण
तमाम तामझाम से दूर ‘कथा’ के 21वे अंक का लोकार्पण ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ अग्रेसर के उद्घाटन समारोह के दौरान  सादगी के साथ हुआ । कथा के संपादक दुर्गा सिंह, कथाकार शिवमूर्ति, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. रामदेव शुक्ल और कमल नयन पाण्डेय ने पत्रिका का लोकार्पण किया । कथा का यह अंक अपनी सामग्री में बहुत समृद्ध और पठनीय है । पत्रिका का प्रकाशन कथाकार मार्कण्डेय की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला है तथा सम्पादक दुर्गा सिंह से उम्मीद है कि इसे आगे भी जारी रखेंगे ।

रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया गया
समकालीन जनमत के संपादक के के पाण्डेय ने इस अवसर पर रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया । सफ़दर को याद करते हुए के के पाण्डेय ने उनकी रंगकर्म के प्रति निष्ठा, राजनैतिक चेतना, किसान-मजदूरों के बीच उनके काम और उनकी लोकप्रियता का जिक्र किया तथा उनकी एक कविता का पाठ भी किया जो पुस्तकालय स्थापना के लिहाज से भी बहुत मौजूँ है-

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की
एक-एक पल की।
खुशियों की, गमों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
सुनोगे नहीं क्या
किताबों की बातें?

पुस्तकालय का एक हॉल होगा त्रिलोचन के नाम पर
पुस्तकालय से जुड़े हुए एक रीडिंग हॉल को सुल्तानपुर की धरती के महाकवि त्रिलोचन के नाम पर त्रिलोचन सभागार नाम दिया गया । ललित कला अकादमी से पुरस्कृत चित्रकार श्री प्रभाकर राय द्वारा बनाये गए त्रिलोचन के पोर्ट्रेट कथाकार शिवमूर्ति ने ममता सिंह को भेंट की जिसे हॉल में लगाया जाएगा ।

दूसरा सत्र रहा कविताओं के नाम

कार्यक्रम का दूसरा सत्र कविताओं के नाम रहा । इस सत्र में  कुछ महत्वपूर्ण लोगों ने अपने विचार भी साझा किए ।
दूसरे सत्र में के.के. पांडे के संचालन में कविता पाठ हुआ जिसमें सर्वश्री ओमप्रकाश मिश्र, प्रदीप कुमार सिंह, डॉ. सी.बी.भारती, अनिल सिंह , बृजेश यादव,  मृदुला शुक्ल, आशा राम जागरथ और बालेन्द्र परसाई ने भी अपने पुस्तकालय अनुभवों को व्यक्त करते हुए शुभकामनाएँ दी और कविता पाठ किया |

इस गरिमामय आयोजन में मध्यप्रदेश के पिपरिया से एकलव्य के गोपाल राठी और भोपाल से बालेन्द्र परसाई ने शिरकत की | गोपाल राठी ने अपने विचार साझा करते हुए पाठकों की गिरती संख्या और पढ़ने के प्रति अरुचि पर चिंता जाहिर की और इस विपरीत समय में इस प्रयास की सराहना की और अपनी शुभकामनायें प्रकट की | कार्यक्रम में ममता सिंह की अर्मेनियाई मित्र  लूसी ने ने  अपने हिंदी भाषा के प्रति प्रेम को व्यक्त किया, अनुराग सिंह ने इस पूरे कार्यक्रम को अपने सपने के पूरा होने की शुरुआत के रूप में रेखांकित किया | इस कार्यक्रम में सम्भावना कला मंच, गाजीपुर  के राजकुमार , ममता और टीम ने शानदार कविता पोस्टर  तैयार किये और प्रदर्शनी लगायी जिसकी सभी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की | कार्यक्रम में उपस्थित अनेक मित्रों ने अपने यहाँ भी इस तरह की पहल का वायदा किया और हम उम्मीद करते हैं कि इस अभियान का हम अन्य जगहों पर तेजी से प्रसार कर सकेंगे |

गीतेश सिंह द्वारा सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय के लिए जारी
9452887696
6 जनवरी 2018

दलितों- अल्पसंख्यकों पर हमले के खिलाफ ,चंद्रशेखर आजाद रावण की रिहाई के लिए कंवेंशन

देश का विकास व युवाओं को रोजगार देने का वादा करके आयी भाजपा सरकार नफरत फैला रही है. इसकी साफ -साफ आवाज कोप्पल जिले के कूकानूर में आयोजित कार्यक्रम में कौशल विकास उद्यमिता मंत्री अनंत कुमार हेगड़े द्वारा दिये गये भाषण में सुनायी देती है, वे कहते है कि बीजेपी संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी है, जो लोग खुद को धर्म निरपेक्ष व वुद्धिजीवी मानते है, उनकी कोई पहचान नहीं होती है. उक्त बातें आइसा के प्रदेश सचिव सुनील मौर्य लखनऊ प्रेस क्लब में 03 जनवरी को सावित्रीबाई फुले के जन्म दिवस पर आयोजित कंवेशन में कही. उन्होने कहा कि भाजपा के बदलाव की दिशा रोजगार देने व विकास करने की नहीं है. अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (एपवा) की नेता मीना सिंह ने कहा कि सरकार की कोशिश देश व प्रदेश में सांप्रदायिक- जातिवादी उन्माद व नफरत पैदा करके बांटने की है. अख़लाक़, पहलूखान, जुनैद, अफराजुल की हत्या इसी नफरत का ही परिणाम है. सरकार अख़लाक की हत्या के मामले में हत्यारों को सजा दिलाने के वजाय इस पर ज्यादा ध्यान दे रहीं है कि घर में रखा मांस किसका था. जुनैद की हत्या में तो सरकार हत्यारों को बचाने में ही लगी हुई है. अदालत के जज ने कहा कि एडिशनल एडवोकेट जनरल आरोपी पक्ष की तरफ से केस नहीं लड. सकते क्योंकि आप सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे है. एडवोकेट जनरल द्वारा आरोपी पक्ष को सुनवाई के दौरान पूछे जाने वाले सवाल को बताये जाने पर जज ने कहा कि इससे गलत संदेश जायेगा और पीड़ित पक्ष के बीच असुरक्षा की भावना पैदा करेगा. ये हरकत पेशेवर कदाचार माना जायेगा.
अध्यक्षता करते हुए जन संस्कृति मंच से जुड़े बुध्दिजीवी आर. के. सिन्हा ने कहा कि मुसलमानों के साथ-साथ दलितों पर सरकारी दमन तेज हुआ है. भीमा कोरेगॉव, ऊना, शब्बीरपुर सहारनपुर बनगी भर है.
सामंती मनुवादी शक्तियों द्वारा हुए हमलों के खिलाफ दलित प्रतिरोध भी तेज हुआ है, लेकिन सरकारों का रवैया सामंती शक्तियों के पक्ष में ही होता है. शब्बीरपुर शहारनपुर की दलितों की बस्तियाें को जलाने वाले ठाकुर जाति के लोगो को गिरफ्तार करके सजा देने के वजाय हमले का प्रतिवाद करने वाले भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ व उनके साथियों पर कई मुकदमें लादकर जेल में बंद कर दिया गया. जिस दिन उच्चन्यायालय इलाहाबाद से सभी मुकदमों में जमानत मिल जाती है उसी दिन चंद्रशेखर पर रासुका लगा दिया जाता है.

कन्वेंशन में उपस्थित लोग


आइसा -इनौस ने भीमा कोरेगांव में दलितों पर हमला करनें वालों को गिरफ्तार करने, मुसलमानों के खिलाफ नफरत व हत्या पर रोक लगाने,चन्द्रशेखर आजाद रावण पर से रासुका हटाकर अविलंब रिहा करने करने की मांग की. कन्वेंशन को आइसा नेता शक्ति रजवार, शैलेश पासवान, रिहाई मंच से राजीव यादव, चन्द्रशेखर आजाद रावण रिहाई आंदोलन के नेता मनीष कुमार, इनौस के नेता ओम प्रकाश, रणविजय सिंह, प्रियंका, टीपू सुल्तान, एक्टू नेता छोटे लाल,अतुल, मुकुन्द यादव ,राजीव ने संबोधित किया. संचालन शिवा रजवार ने किया.कन्वेंशन का आयोजन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) व इंकलाबी नौजवान सभा (इंनौस) के बैनर तले हुआ.

पूरब के ऑक्सफ़ोर्ड की पतनगाथा- अभिषेक श्रीवास्तव

कभी पूरब का ऑक्‍सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, यह बात शनिवार को इंडियन एक्‍सप्रेस सहित कई अखबारों में छपी यूजीसी की ऑडिट रिपोर्ट की खबर से सामने आ चुकी है। यह ख़बर विश्‍वविद्यालय में 13 नवंबर से 15 नवंबर के बीच मानव संसाधन मंत्रालय की सिफारिश पर विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा गठित छह व्‍यक्तियों की एक टीम की जांच पर आधारित है। ऑडिट रिपोर्ट तमाम किस्‍म की गड़बडि़यों को उजागर करते हुए भी कुलपति रतन लाल हंगलू को व्‍यक्तिगत रूप से दोषी नहीं मानती है।

इंडियन एक्‍सप्रेस की खबर कहती है, ”कथित वित्‍तीय, अकादमिक और प्रशासनिक अनियमितताओं के चलते जहां कुलपति आरएल हंगलू एचआरडी मंत्रालय के निशाने पर हैं, वहीं यह रिपोर्ट हालांकि उन्‍हें इसका जिम्‍मेदार नहीं ठहराती। वास्‍तव में रिपोर्ट कहती है कि कुछ पुराने ”अवकाश प्राप्‍त एक्टिविस्‍ट प्रोफेसरों का एक समूह” कुलपति के काम में अड़ंगा डालने की जबरन कोशिश कर रहा है।” इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के पतन का अहम सूत्र इस एक वाक्‍य में छुपा है।

अगर थोड़ा पीछे जाकर कुलपति द्वारा केंद्र से किए पत्राचारों को देखें, तो हम पाते हैं कि रतन लाल हंगलू के दिसंबर 2015 में पद संभालने से पहले ही इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय भ्रष्‍टाचार में आंकठ डूब चुका था। अपने पिछले बयानों में हंगलू लगातार यह बात दुहराते रहे हैं कि उनके अपने कार्यकाल में कोई वित्‍तीय गड़बड़ी नहीं हुई है, सब पहले का है। वे प्रधानमंत्री से लेकर राष्‍ट्रपति और सीएजी (महालेखा नियंत्रक और परीक्षक) तक तमाम लोगों को इससे काफी पहले आगाह कर चुके थे, लेकिन इस जांच को लगातार टाला गया और परदे के पीछे कुछ और ही पकता रहा। जो कुलपति खुद अनियमितताओं की जांच की सिफारिश सरकार से करता रहा, उसी के खिलाफ मानव संसाधन मंत्रालय ने राष्‍ट्रपति से एक नहीं दो बार जांच की सिफारिश कर दी।

आज हंगलू को कुलपति बने दो साल पूरे हो रहे हैं। बीते दो साल की कहानी बेहद दिलचस्‍प है। हंगलू को जहां इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय की सफ़ाई की चिंता सताती रही, वहीं केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय विश्‍वविद्यालय से इस कुलपति को ही साफ़ करने की मुहिम में जुटा रहा। हंगलू की चिट्ठियों से किसी के हित को चोट पहुंच रही थी? कौन नहीं चाहता था कि 2005 में केंद्रीय विश्‍वविद्यालय बनने के बाद से यहां हुई गड़बडि़यों को सामने लाया जाए? क्‍या ये वही ”अवकाश प्राप्‍त एक्टिविस्‍ट प्रोफेसरों का एक समूह” था, जिसका जि़क्र यूजीसी की रिपोर्ट करती है? मुट्ठी भर पुराने प्रोफेसर इतने ताकतवर कैसे हो सकते हैं कि कुलपति के खिलाफ मंत्रालय को भड़का दें? छात्रों के कल्‍याण के नाम पर वे कौन लोग थे जो इलाहाबाद की दीवारों पर कुलपति को देशद्रोही घोषित करने में जुटे थे?

”अवकाश प्राप्‍त एक्टिविस्‍ट प्रोफेसरों का एक समूह” कह कर यूजीसी की ऑडिट रिपोर्ट क्‍या मामले को समेटने और वास्‍तव में कुछ दूसरे लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है? एक कुलपति अपने विश्‍वविद्यालय का प्रशासनिक संरक्षक होता है। अनियमितताओं के लिए अलग से उसे ”जिम्‍मेदार नहीं ठहराने” की बात कहने का क्‍या कोई ‘ऑपरेटिव’ मतलब वास्‍तव में बनता है? कहीं यह वाक्‍य केंद्र सरकार का एक ”डिसक्‍लेमर” तो नहीं, कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे?

हालिया घटनाक्रम

बीते 19 दिसंबर को इलाहाबाद टीचर्स यूनियन ने कुलपति हंगलू के समर्थन में एक मार्च निकाला। मार्च में करीब 500 प्रोफेसर शामिल थे। इन शिक्षकों का कहना था कि पिछले कुछ दिनों से बेवजह कुलपति को परेशान किया जा रहा है। कुलपति के खिलाफ कुछ लोग दिल्ली में अफवाह फैला रहे हैं। विश्‍वविद्यालय से जुड़े कॉलेज के शिक्षक भी इस मार्च में शामिल हुए। अगले ही दिन छात्रों ने यूनियन हॉल गेट से बालसन चौराहे तक कुलपति के समर्थन में कैंडिल मार्च निकाला और बिलकुल वही आरोप दोहराए जो शिक्षकों ने किन्‍हीं ”अराजक तत्‍वों” पर लगाए थे। आखिर कौन हैं वे ”अराजक तत्‍व” जो कुलपति के लिए सिरदर्द बने हुए हैं और जिनके खिलाफ शिक्षक और छात्र एकजुट हो गए हैं? जिन्‍हें यूजीसी की ऑडिट रिपोर्ट ”पुराने अवकाश प्राप्‍त एक्टिविस्‍ट प्रोफेसरों” का एक समूह कहती है, कहीं वे ही तो नहीं है जो कुलपति हंगलू के पीछे पड़े हैं? कहानी के दो आयाम हैं।

कुलपति के समर्थन में मार्च निकालने वाले शिक्षकों में शामिल इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय संघटक महाविद्यालय शिक्षक संघ (आक्‍टा) के अध्‍यक्ष डॉ. सुनीलकांत मिश्र कुलपति के उठाए तरक्‍कीपसंद कदमों को गिनाते हुए शिकायत करते हैं कि कुलपति पिछले छह माह से एचआरडी मंत्री से दिल्‍ली में मिलने का वक्‍त मांग रहे हैं लेकिन उन्‍हें समय नहीं दिया जा रहा है। यह गंभीर बात है क्‍योंकि यूजीसी की ऑडिट टीम के अतिरिक्‍त एचआरडी मंत्रालय खुद यहां जांच के लिए नवंबर में एक टीम भेज चुका है। अगर मंत्रालय जांच टीम भेज सकता है, तो मंत्री को कुलपति से मिलकर बात करने में क्‍या दिक्‍कत है?

दूसरा सवाल शिक्षकों और छात्रों के मार्च के खिलाफ बयान देने वाले छात्र संघर्ष संयुक्‍त मोर्चा नाम के एक संगठन की कार्रवाइयों से पैदा होता है। जिस दिन शिक्षकों ने कुलपति के समर्थन में मार्च निकाला, इस मोर्चे के छात्रों ने मार्च में शामिल शिक्षकों को फूल देकर कुलपति का साथ न देने का आग्रह किया। स्‍थानीय अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक इस मोर्चे के एक छात्र नेता ने कहा कि मार्च में शामिल शिक्षकों के बारे में मंत्रालय को जानकारी भेज दी गई है। ठीक इसी तरह 21 दिसंबर को छात्रों के मार्च के दिन इस मोर्चे ने इस मार्च के खिलाफ एक ”बुद्धि-शुद्धि यज्ञ” करवाया। स्‍थानीय अखबारों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक नेता का बयान छापा है कि अगर सरकार कुछ दिनों में कार्यवाही नहीं करती है तो विवि में कुलपति के खिलाफ आंदोलन होगा। इन छात्र नेताओं ने राष्‍ट्रपति से उन शिक्षकों की शिकायत की है जो मार्च में शामिल हुए थे।

कुलपति के समर्थन में निकली इन दो पदयात्राओं से पूर्व बीते 13 दिसंबर को हंगलू के ऊपर कुछ छात्रों ने हमला किया था और गाली-गलौज की थी। जो छात्र इसमें शामिल थे उन्‍हें कोर्ट ने पिछले साल ऐसी ही अराजकताओं का दोषी पाया था। विश्‍वविद्यालय के पुराने छात्रों के मुताबिक इन छात्रों के सिर पर कुछ रिटायर हो चुके प्रोफेसरों का हाथ हैं। इन प्रोफेसरों के ऊपर यूजीसी के फंड से लाखों रुपये गबन करने का आरोप है, जिसका जि़क्र नाम सहित कुलपति ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में किया था। आरोप है कि ये प्रोफेसर भाजपा नेता मुरली मोहर जोशी, आरएसएस के कृष्‍ण गोपाल और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के साथ नियमित संपर्क में रहते हैं और उन्‍हें फीडबैक देते हैं। कुलपति विरोधी इसी समूह में एक अदृश्‍य शख्‍स का नाम बार-बार आता है, जो आजकल एनसीईआरटी, दिल्‍ली में डेपुटेशन पर तैनात है। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में जो कुछ ज़ाहिर है, उससे कहीं ज्‍यादा परदे के पीछे है। बीएचयू में भी ऐसा ही था, जो पूर्व कुलपति जीसी त्रिपाठी के हटने के बाद भी पूरी तरह नहीं खुल सका है। जो प्रत्‍यक्ष है, अभी हम उसी पर बात करेंगे।

उपर्युक्‍त हालिया घटनाक्रम (13 दिसंबर 2017 से लेकर अबतक) से पहली बात यह साफ़ होती है कि यूजीसी की ऑडिट रिपोर्ट जिन ”अवकाश प्राप्‍त एक्टिविस्‍ट प्रोफेसरों के समूह” का जिक्र करती है, कुलपति-विरोध में उन्‍हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और छात्र संघर्ष मोर्चे का समर्थन प्राप्‍त है। मोटी कहानी यह बनती है कि भारतीय जनता पार्टी और संघ के करीबी कुछ पुराने प्रोफेसर, एबीवीपी, मोर्चा और भ्रष्‍टाचार के कुछ अन्‍य लाभार्थी मिलकर नहीं चाहते कि हंगलू कुलपति बने रहें। इलाहाबाद विवि की राजनीति में मुरली मनोहर जोशी की हैसियत का अंदाजा किसे नहीं है। ये लोग उनके माध्‍यम से दिल्‍ली के ऊंचे पदों तक अपनी पहुंच रखते हैं और केंद्रीय मंत्री तक को प्रभावित करते हैं। यह बात विश्‍वविद्यालय से जुड़े कई लोग खुलेआम कहते रहे हैं। यह स्थिति आखिर कैसे बनी? दो साल के भीतर हंगलू इतने सारे विविध लोगों के निशाने पर कैसे आ गए?

हंगलू को लेकर केंद्र की तल्‍खी पुरानी है, जब तत्‍कालीन एचआरडी मंत्री स्‍मृति ईरानी के कार्यकाल में हंगलू ने विश्‍वविद्यालय में ”राजनीतिक हस्‍तक्षेप” का मुद्दा उठाया था और अचानक विवादों में घिर गए थे। बाद में हालांकि दबाव में आने पर उन्‍हें अपनी यह बात राज्‍यसभा अध्‍यक्ष को एक पत्र लिखकर वापस लेनी पड़ी थी।

हंगलू ने 2016 में प्रवेश परीक्षा की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया था जिसके बाद उनसे इसे ऑफलाइन करने को कहा गया। इस पर हंगलू ने बयान दिया था, ”अगर राजनेता ऐसे ही दखल देते रहे तो हमें यहां से जाना पड़ेगा। सरकार फिर अपनी मर्जी से युनिवर्सिटी को चला सकती है। फिर वो चाहे तो अकादमिकों की जगह विधायकों या सांसदों को कुलपति बना सकती है।”

इस बयान पर काफी विवाद हुआ था और हंगलू केंद्र के निशाने पर आ गए थे। विवाद के दौरान उन्‍होंने एनडीटीवी को दिए एक साक्षात्‍कार में साफ़ कहा था कि उन्‍हें आरएसएस के लोगों, बीजेपी के स्‍थानीय नेताओं और समाजवादी पार्टी समेत कुछ अन्‍य ऐसे लोगों से धमकी मिली है जो ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा के खिलाफ धरनारत छात्रों के समर्थन में हैं। हंगलू ने ऑनलाइन का फैसला बाद में वापस ले लिया, तो धरना खत्‍म हो गया लेकिन विवादों के साथ उनका रिश्‍ता बना रहा। इस तरह कुलपति बनने के छह माह के भीतर ही उनके विरोधी और समर्थक गुटों के बीच विभाजक रेखा परिसर में खिंच चुकी थी, जिसे आज सडकों पर खुलेआम देखा जा रहा है।

कुलपति या सचेतक?

हंगलू ने 31 जुलाई 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक विस्‍तृत पत्र लिखा। पत्र संख्‍या 136(1)/वीसी-2017 में हंगलू ने विश्‍वविद्यालय की ज़मीनी हकीकत के बारे में प्रधानमंत्री को बताते हुए कुछ ज़रूरी बिंदु गिनाए थे:

प्राथमिक जांच में उन्‍होंने पाया कि उनके यहां कुलपति पद पर आने से पहले शिक्षक/गैर-शिक्षक पदों पर एडवांस के बतौर 35 करोड़ रुपया विश्‍विद्यालय की ओर बकाया है जिसका भुगतान नहीं हुआ था (अनुलग्‍नक 1)।
यह भी पाया गया कि वेतन और अन्‍य मद में 912.11 लाख रुपये से ज्‍यादा का घाटा चल रहा है। यह घाटा इसलिए हुआ क्‍योंकि विश्‍वविद्यालय का फंड इंस्टिट्यूट ऑफ करेस्‍पॉन्‍डेंस कोर्स एंड कन्‍टीन्‍यूइंग एजुकेशन को लोन के बतौर वेतन देने के लिए हस्‍तांतरित किया गया, जो कि वित्‍तीय नियमों का खुला उल्‍लंघन है क्‍योंकि ऐसे संस्‍थान और उसके कर्मचारी इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अभिन्‍न अंग नहीं हैं (अनुलग्‍नक 2)।
कुछ ऐसे प्रोफेसर हैं जिन्‍हें यूजीसी की परियोजनाओं के तहत अनुदान मिला था और जिन्‍होंने न तो परियोजना और न ही फंड के बजट के बारे में कोई रिपोर्ट जमा की। हंगलू ऐसे प्रोफेसरों का नाम भी बताते हैं और इनके द्वारा किए गए कुकृत्‍यों का विस्‍तार से खुलासा अनुलग्‍नक 3 में करते हैं।
हंगलू ने अनुलग्‍नक 4 में युनिवर्सिटी के फंड में से 200 करोड़ से ज्‍यादा के अनुमानित घोटाले की बात प्रधानमंत्री को लिखी। उनके मुताबिक यह राशि अयोग्‍य शिक्षकों के वेतनमान में खर्च की गई जो नियमों का उल्‍लंघन है।
अनुलग्‍नक 5 में वे अन्‍य मदों में अनावश्‍यक और अनियमित खर्चों का हवाला देते हैं, जो निजी हित में कुछ लोगों द्वारा अलग-अलग मदों में खर्च किए गए। यह राशि भी करोड़ों में है।
अनुलग्‍नक 6 में एलटीसी के मद में 2012-13 से 2015-16 के बीच हवाई यात्राओं पर किए गए 78.28 लाख के खर्च का जि़क्र है।

हंगलू ने प्रधानमंत्री को बताया कि वे इन सब गड़बडि़यों को दुरुस्‍त करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ‘फर्जी छात्र आंदोलन’ खड़ा कर के तथा ”मानव संसाधन मंत्रालय को निराधार व फर्जी शिकायतें” भेजकर उनके काम में अड़ंगा डाला जा रहा है। वे बताते हैं कि विश्‍वविद्यालय ने ऐसे तत्‍वों को उजागर करने के लिए तीन खण्‍डों में एक साक्ष्‍य रिपोर्ट तैयार की है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि उनके खिलाफ़ की गईं तमाम शिकायतें बेबुनियाद हैं। वे प्रधानमंत्री को यह भी बताते हैं कि उन्‍होंने महालेखा परीक्षक और नियंत्रक (सीएजी) को एक पत्र लिखकर 2005 से विश्‍वविद्यालय का एक ट्रांजिट ऑडिट कराने की मांग की है।

प्रधानमंत्री से पहले 17.07.2017 को उन्‍होंने सीएजी को पत्र भेजा था। पत्र संख्‍या 123/वीसी-2017 में हंगलू ने सीएजी शशिकांत शर्मा से अनुरोध किया था कि 2005 में केंद्रीय विश्‍वविद्यालय का दर्जा मिलने से लेकर अब तक विश्‍वविद्यालय का एक ट्रांजीशनल ऑडिट किया जाए ताकि तंत्र में अखंडता, पारदर्शिता और ईमानदारी आ सके। कुलपति की इन शिकायतों को स्‍थानीय अखबारों में खूब कवरेज मिली थी।

क्‍लीन चिट के बाद

तत्‍कालीन एचआरडी मंत्री स्‍मृति ईरानी से बैर मोल लेने के बाद हंगलू के कई किस्‍म के दबाव पड़े, जिन्‍हें उनके उस वक्‍त लिए फैसलों में देखा जा सकता है। इसी का नतीजा रहा कि अक्‍टूबर 2016 में मानव संसाधन मंत्रालय ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पहली बार हंगलू की जांच कराने संबंधी एक सिफारिश भेजी, जिसे मंजूर कर लिया गया था। कुलपति को नोटिस भेजा गया जिसका उन्‍होंने विस्‍तृत जवाब दिया। इसके बाद मंत्रालय के अधिकारियों की जांच में हंगलू को क्‍लीन चिट दे दी गई थी। उस वक्‍त भी कुलपति लगातार एक ही बात कह रहे थे कि अगर उनके कार्यकाल में गड़बड़ी पाई गई तो उन्‍हें जो सज़ा दी जाएगी मंजूर होगी। ऐसा नहीं हुआ। कुलपति फरवरी 2017 में बेदाग होकर निकले।

इसके बाद ही यूजीसी की ऑडिट का फैसला लिया गया और रामनाथ कोविंद के राष्‍ट्रपति बनने के बाद एक बार फिर से हंगलू के खिलाफ जांच की सिफारिश की गई, जिस पर 12 नवंबर को दिल्‍ली से टीम ने विश्‍वविद्यालय का दौरा किया। यह टीम जेल में बंद कुछ छात्रों से मिलने भी गई थी। ये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र थे। फेसबुक पर एबीवीपी के छात्रों की पोस्‍टों से पता चलता है कि उनका गुस्‍सा दरअसल संगठन के छात्रों के निष्‍कासन और जेल भेजे जाने को लेकर ही था। इन छात्रों के आक्रोश को कुछ पुराने लोग अपने स्‍वार्थ में हवा देने में जुटे थे।

हंगलू के कुलपति बनने के दो साल के भीतर पैदा हुई इस नाटकीय स्थिति के बीच यूजीसी की ऑडिट रिपोर्ट भले उनके लिए थोड़ा राहत लेकर आई हो, लेकिन छात्रों-शिक्षकों के बीच उन्‍हें लेकर पैदा हुआ ध्रुवीकरण अब भी उन ‘अराजक तत्‍वों’ को परिदृश्‍य से बाहर रखे हुए है जो बीते 12 साल में परिसर के पतन के लिए मुख्‍य जिम्‍मेदार हैं। सवाल उठता है कि यूजीसी की रिपोर्ट आ जाने के बाद क्‍या ”अवकाश प्राप्‍त एक्टिविस्‍ट प्रोफेसरों के समूह” और ”अराजक तत्‍वों” की अलग से जांच यह सरकार करेगी? क्‍या इन लोगों की पहचान की जाएगी या फिर बीएचयू की तर्ज पर परिसर को जलने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

बीएचयू का अध्‍याय इस बात का गवाह है कि कुलपति तो चले गए लेकिन अपने पीछे एक सुलगता हुआ परिसर छोड़ गए। पिछले दिनों एक छात्र नेता को लेकर हुआ बवाल दिखाता है कि सही समय पर अगर ‘अराजक तत्‍वों’ की पहचान कर ली गई होती तो आज यह स्थिति न होती। जानने वाले जानते हैं कि बीएचयू में ऐसा कभी नहीं होना था क्‍योंकि मामला सीधे संघ से जुड़ा था। प्रो. जीसी त्रिपाठी जाते-जाते अपने फेयरवेल में साफ़ कह गए थे कि उनके ऊपर अयोग्‍य लोगों को रखने का दबाव था। सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि यह दबाव किसका था क्‍योंकि ऐसा कर के वह अपनी ही गरदन फंसा लेगी।

बीएचयू का ‘अराजक तत्‍वों’ वाला मॉडल हूबहू इलाहाबाद में भी काम कर रहा है। फ़र्क सिर्फ ये है कि बीएचयू में कुलपति त्रिपाठी ने ‘अराजक तत्‍वों’ का अपने हित में अपनी कारगुज़ारियों को छुपाने के लिए अंत तक इस्‍तेमाल किया और जाते-जाते सुलगते रहने के लिए छोड़ गए, जबकि इलाहाबाद में रतन लाल हंगलू ने पहले ही दिन इन लोगों की शिनाख्‍त कर ली और निशाने पर आ गए।

यह रिपोर्ट मीडिया विजिल से साभार.इस रिपोर्ट को लिखा है अभिषेक श्रीवास्तव ने।

पीजी को मदरसा क्यों कह रहे “अखबार”

हम बात कर रहें हैं आज देश की प्रमुख समाचार एजेंसी “हिंदुस्तान” की, कहते हैं देश के लोगो को किस दिशा में ले जाना है वो मीडिया के हाथ मे हैं, दिमाग मे गोबर भरे पत्रकार इस देश के पाठकों के मस्तिष्क में भी गोबर भरने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। दैनिक अखबार हिंदुस्तान जिसके लाखो पाठक हैं ने आज सुबह अपनी अखबार के फ्रंट पेज पर एक फर्जी खबर लगाई है जिसमे लिखा है -“मदरसे में बंधक 51 लड़कियां छुड़ाईं” इस हेडिंग को पढ़कर ही लगता है कि अखबार को कहाँ से फंडिंग जो रही है, अखबार के संपादक व्हाट्सप यूनिवर्सटी के टॉपर लगते हैं। तभी तो बिना जांच परख के ही ऐसा आर्टिकल पब्लिश कर दिया जिससे हकीकत का कोई संबंध ही नही है।

अखबार में लिखी घटना की पड़ताल की गई तो पता चला कि ये दो पार्टियों का आपसी झगड़ा है। ये एक PG (पे इन गेस्ट) गर्ल्स होस्टल है दूर दराज से शिक्षा ग्रहण करने आई लड़कियां रहती हैं। जिसमें एक पार्टी ने दूसरी पार्टी पर ये आरोप लगाया की उक्त होस्टल संचालक उसके बराबर में सटे मदरसे पर जिसमे वो टीचर भी है पर कब्जा करना चाहता है।

लखनऊ के एक सोशल एक्टिविस्ट सलमान सिद्दीकी ने जमीन स्तर पर पड़ताल करने के बाद लिखा है –

मैं लखनऊ से हूँ ! बात ये है कि मदरसे के जो संस्थापक हैं (उन्ही की ज़मीन भी है) , उनको शक़ हुआ कि जिस आदमी को उन्होंने मदरसे में पढ़ाने के लिए रखा है, वो कब्ज़ा करना चाहता है ! उसने होस्टल टाइप भी शुरू कर दिया जो कि नहीं होना चाहिए ! उसको ठिकाने लगाने के लिए ये ड्रामा किया गया ! सीधी उँगली से घी नहीं निकल रहा था तो उंगली टेढ़ी कर ली गयी ! बाकी मीडिया की बकवास एक झूठे प्रोपगेंडे से ज़्यादा कुछ नही है !

इसके बाद पुलिस ने मदरसे पर अपना काम किया और रही सही कसर मीडिया ने तोड़ दी ही।

सोशल मीडिया पर इस खबर को लेकर काफी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं एक फेमस सोशल एक्टिविस्ट Shadan Ahamad ने इस मामले की जड़ तक जाकर सरकार को घसीटा है

Shadan Ahmad लिखते हैं

खबर यह आ रही है के मीडिया जिसको मदरसा बता के बदनाम करने के लिएे खबर चालाया वोह दरसल Woman Pg था .

मदरसों में तो उनको कुछ मिल नही पाता , तुफान मचा नही पा रहा .

अब यह मीडिया वाले PG को मदरसा क्यूँ बताया ,यह तो अाप समझ ही गयी होंगे . मीडिया का one point agenda दिन रात का एक ही है इस्लाम से नफरत पैदा करना .

जिस तरह से अाप का कोई नेता नही है वैसा ही कोई बड़ा tv मीडिया अाप के पास नही है जो सच दिखा के इनको बेनकाब कर पाये .
लोगों ने पहले ही आगाह किया था जिस रफतार से ब्रहामन बाबा लोग अश्रामों में धरा रहे हैं ,बैलन्स बनाने के लिएे किसी ना किसी मुल्ले की गर्दन जल्दी चाहिए ,मदरसा टार्गेट हो सकता है .

लखनऊ में मुफ़ति पर इलजाम लगाया गया है पिटायी का , मगर मामला बाबाओं के बराबार करने के लिएे पुरी तरह से यौन शोषन का बना के दिखा दिया गया है , जबकी खाना बनाने वाली औरत जो रोज़ मदरसे में जाती थी साफ कह रही है हमने कभी ऐसा नही देखा . जिन की बच्चियां पढती थीं उनकी माँ कह रही है हमारी बच्चियों ने कभी ऐसी शिकायत नही की .

SP साहब तिवारी जी बड़े सक्रये हो गये हैं ,मीडिया लिखती है लड़कियों को ‘Rescue ‘ किया गया .काहे का Rescue बे , आश्रम की तरह वहां लठइत ,बन्दुक धारी गुंडे थे जो बंधक बनाये हुए थे लड़कियों को ताक़त से ?

बाबाओं के आश्रम को तो पुलिस घेर कर कितने दिन रखती थी ,अंदर से गोली चलती थी . यहा तो किसी लड़की ने छत से प्रताड़न होने का खत गिराया (रेप की शिकायत ही नही है ,बुरे व्यवहार की शिकायत है ) तो खबर मिलते ही मदरसे के मालिक और अन्य लोक़ल मुस्लिम ने पुलिस बुलाया और मुफती को गिर्फतार करवाया .यह बुनियादी फर्क है मानसिकता का ,दूसरा एंगल जो आ रहा है जैसा लखनऊ के लोकल बता रहे हैं के ज़मीन का मामला है, ज़मीन के मालिक को ज़मीन वापस चाहिए थी।

फिर ‘Rescue ‘ कैसे हुआ बे . शिकायत हुई होस्टेल को सिल कर दिया गया ,सही गलत बाद में पता चलेगा पर मुस्लिम पहले लड़कियों के समर्थन में खड़े हुए .

पद्मावती फिल्म “पद्मावत” नाम से होगी रिलीज

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ की रिलीज को लेकर चल रहे गतिरोध के खत्म होने का रास्ता साफ हो गया है। सेंसर बोर्ड ने फिल्म को हरी झंडी देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें सबसे पहली शर्त यह है कि फिल्म का नाम बदला जाए और इसे ‘पद्मावती’ की जगह ‘पद्मावत’ नाम दिया जाए। गौर करने की बात है कि ‘पद्मावत’ सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना थी और पद्मावती नाम की रानी का काल्पनिक किरदार उन्होंने ही गढ़ा था।

सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 26 कट करने का भी सुझाव दिया है। इसके अलावा बोर्ड ने यह भी कहा है कि फिल्म के शुरू होने और मध्यांतर के वक्त एक डिस्क्लेमर भी चलाया जाए।

सेंसर बोर्ड ने फिल्म को परखने के लिए एक विशेष पैनल गठित किया था जिसमें इतिहासकार और राजस्थान के पूर्ववर्ती रॉयल परिवार से जुड़े हुए लोग थे।
इस फिल्म को लेकर विवाद भी बढ़ रहा है। देश के कई राज्यों में फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर करणी सेना के कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

मेरठ में एक राजपूत नेता ने कहा था कि जो संजय लीला भंसाली का सिर काट कर लाएगा, उसे पांच करोड़ का इनाम दिया जाएगा।

करणी सेना ने फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को भी चेतावनी दी थी। सेना के प्रदेश अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने कहा था, “राजपूतों ने कभी औरतों पर हाथ नहीं उठाया, लेकिन जरूरत पड़ी तो हम दीपिका के साथ वही करेंगे जो लक्ष्मण ने शूर्पणखा के साथ किया था।”

फिल्म ‘पद्मावती’ पर विवाद बढ़ता देख उत्तर प्रदेश की सरकार ने केन्‍द्र को पत्र लिखकर कहा था कि राज्‍य में स्‍थानीय निकाय चुनाव को देखते हुए फिल्‍म को 1 दिसम्‍बर को रिलीज नहीं किया जाए। प्रदेश सरकार ने कहा था कि 1 दिसंबर को फिल्मी पद्मावती का रिलीज होना राज्य की शांति व्‍यवस्‍था के हित में नहीं होगा।

कई और संगठन भी फिल्म के प्रदर्शित होने पर सिनेमाघरों में तोड़फोड़ और आगजनी की चेतावनी दे रहे थे।




गोरखपुर उपचुनाव में देरी क्यों?

चुनाव आयोग के एक और ऐलान ने फिर से विवादों को जन्म दे दिया है, उसने देश में लंबे समय से रिक्त पड़े 7 में से 3 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव कराने के तारीखों की घोषणा की जबकि 4 सीटों के लिए तारीखों का ऐलान नहीं किया.

लोकसभा के जिन 3 सीटों पर उपचुनाव के तारीखों का ऐलान हुआ है उन सीटों के नाम हैं राजस्थान से अलवर और अजमेर तथा पश्चिम बंगाल से उल्बरिया लोकसभा सीट. यहां के सीटिंग सांसदों के निधन के बाद उपचुनाव कराए जा रहे हैं.

जबकि आयोग ने गोरखपुर, फूलपुर के अलावा बिहार के अररिया और जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर तारीखों का ऐलान नहीं किया.

इसी साल मार्च में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने सितंबर में गोरखपुर से संसदीय सीट छोड़ी थी जबकि कैशव प्रसाद मौर्य ने उपमुख्यमंत्री बनने के बाद फूलपुर सीट से इस्तीफा दिया.

वहीं अनंतनाग सीट जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के लोकसभा सीट छोड़ने के बाद खाली हुई थी. यह सीट 4 जुलाई, 2016 से ही खाली चल रही है. सुरक्षा कारणों से यहां पर उपचुनाव नहीं कराए जा सके हैं. दूसरी ओर, बिहार के अररिया सीट से राष्ट्रीय जनता दल के सांसद रहे मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद से यह सीट खाली है और यहां उपचुनाव कराए जाने हैं.

गोरखपुर में उपचुनाव में देरी क्यों?

गोरखपुर और फूलपुर संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव के तारीखों के ऐलान नहीं होने पर सवाल उठना लाजिमी है. इससे पहले आयोग ने जब हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान किया, लेकिन गुजरात का नहीं किया था. इसकी विपक्षी दलों ने तीखी आलोचना की और गंभीर सवाल उठाए थे.

अब यही हालात यूपी के इन 2 बहुचर्चित सीटों पर उपचुनाव को लेकर भी बने हैं. जिन 3 सीटों पर उपचुनाव के तारीखों का ऐलान हुआ है वहां 29 जनवरी को मतदान होगा जबकि 1 फरवरी को फैसला आ जाएगा. दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से जारी सूचना के मुताबिक गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा के खाली पड़ी सीटों पर 22 मार्च से पहले उपचुनाव हो जाने चाहिए. ऐसे में इन अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है.

कहा यह भी जा रहा है केंद्र में सत्तारुढ़ भाजपा के लिए इन दोनों सीटों पर योग्य उम्मीदवारों की तलाश अभी जारी है, दोनों सीट पार्टी के लिए बेहद अहम है, लेकिन बदलते हालात में उसके पास सीट बचाने के लिए कड़ी चुनौती मिलती दिख रही है. ऐसे में इन जगहों पर उपचुनाव के तारीखों के ऐलान में देरी हो रही है।



नये साल में भी गेस्ट फैकल्टी के भरोसे इविवि

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में काफ़ी समय से अध्यापकों की क़िल्लत चल रही है। यूनिवर्सिटी में अध्यापकों के पद ख़ाली पड़े हैं और गेस्ट टीचर्स पढ़ाने को मजबूर हैं।

ख़ाली पड़े शिक्षकों के पद

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में 542 शिक्षकों के पद ख़ाली पड़े हैं। इन पदों पर पर भर्ती होनी है। इसके लिए आवेदन मांगे गए थे।

गेस्ट टीचर्स की नियुक्ति यूनिवर्सिटी की मजबूरी

यूनिवर्सिटी को करीब 25 हजार आवेदन प्राप्त हुए हैं पर अभी तक साक्षात्कार नहीं शुरू किया जा सका है। ऐसे में आगामी सत्र में भी अतिथि प्रवक्ताओं की नियुक्ति करना विवि की मजबूरी होगी। ऐसे में नए शैक्षिक सत्र में भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में शिक्षकों का टोटा बना रहेगा।

रोक दिया गया शिक्षकों का चयन

12 जुलाई 2013 को 16 विभागों के लिए 56 शिक्षकों का चयन किया गया था। इनमें प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और कई असिस्टेंट प्रोफेसर शामिल हैं। इसके बाद कुछ कारणों के चलते चयन रोक दिए गए। पिछली कार्यसमिति की बैठक में भी यह मुद्दा उठा था। यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारियों ने दावा किया था कि नए शैक्षिक सत्र के शुरू होने से पूर्व ही सभी विभागों के 542 शिक्षकों का चयन कर लिया जाएगा। हालांकि ऐसा नहीं हो सका।


पैनल सदस्यों की ग़ैर उपस्थिति

यूनिवर्सिटी ने फिर से 21 अक्टूबर 2017 से चयन समिति का आयोजन करने का फैसला किया। 21 अक्टूबर से रक्षा अध्ययन विभाग में व 22 अक्टूबर को अर्थ एवं प्लेनेटरी साइंस में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए साक्षात्कार कार्यक्रम घोषित किया गया था। विजिटर के नॉमिनी के पैनल के सदस्यों में से किसी के भी उपलब्ध न हो पाने के कारण यूनिवर्सिटी को साक्षात्कार स्थगित करना पड़ा।तब से अब तक साक्षात्कार कब होंगे इसकी कोई आधिकारिक सूचना अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय नहीं दे सका है।

यूनिवर्सिटी में कुल 300 अध्यापक

ऐसे में नया सत्र शुरू होने से पहले अतिथि प्रवक्ताओं की नियुक्ति करना यूनिवर्सिटी की मजबूरी है। वर्तमान में यूनिवर्सिटी में करीब 300 शिक्षक ही बचे हैं। कई विभाग ऐसे भी हैं जिनमें सिर्फ एक-दो शिक्षक ही तैनात हैं।


अटेंडेंस की अनिवार्यता के खिलाफ जेएनयू के छात्रों का प्रदर्शन

जेएनयू में अटेंडेंस की अनिवार्यता की खबर के बाद छात्रों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। पिछले हफ्ते जेएनयू प्रशासन द्वारा नोटिस के ज़रिये इसकी सुचना छात्रों को दी गयी थी।

इस नोटिस में अगले आने वाले सेमेस्टर से अटेंडेंस सभी क्लास में अनिवार्य होगा। ग्रैजूएशन से लेकर पीएचडी तक सभी जगह यह नियम लागू होना है। जेएनयू में अटेंडेंस कि अनिवार्यता नहीं रही है। छात्रों को क्लास में लाने के लिए अटेंडेंस अनिवार्य न हो कर गुणवत्ता की शिक्षा महत्व रखती है। यह जेएनयू कि अपनी ख़ास पहचान रही है।

प्रशासन के इस रवैये के बाद सभी छात्र दल और जेएनयूएसयू ने इसका विरोध किया है। जेएनयू एसयू अध्यक्ष गीता कुमारी ने यूनिवर्सिटी सर्किल को बताया कि आज रात इस मुद्दे पर सभी छात्र दल से बात होगी और इसका किस तरह विरोध किया जाए, वह मैप भी तैयार करेंगे।

पिछली खबर तक यह साफ़ नहीं था कि अनिवार्यता किस क्लास तक है परन्तु प्रशसन के नोटिस के बाद यह साफ़ हो चूका है। जेएनयू एक शोध संस्थान है। अटेंडेंस की प्रथा कभी क्लास में नहीं रही है। छात्र यह समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसा नियम क्यों बनाया गया है। कुछ छात्रों का मानना है कि यह प्रशासन की तरफ से छात्रों को परेशान करने का फिर एक नया रास्ता है।

जेएनयू के बाहर के छात्रों में इसे लेकर असमंजस की स्थिति है। सोशल मीडिया में मिली-जुली प्रतिक्रिया आ रही है। जिन छात्रों को जेएनयू के बारे में पता है, वह वहाँ के छात्रों की स्तिथि समझ रहे हैं। अन्य सामान्य छात्रों को इस नियम में कोई समस्या नहीं दिख रही है। जेएनयू के छात्रों के लिए यह भी एक समस्या है कि वह इस नियम के विरोध में सभी छात्रों से समर्थन प्राप्त करें और जेएनयु के बाहर इस संदेश को सही रूप में संप्रेषित करें।


इलाहाबाद विश्वविद्यालय पैसों की कमी, अंदरूनी राजनीति के चलते बहुत बुरी स्थिति में पहुंच चुका है.

यूजीसी की एक समिति ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का दौरा कर अपनी आॅडिट रिपोर्ट में कहा है कि यह विश्वविद्यालय ‘अलाभकारी’ और ‘अप्रभावी’ साबित होने के कगार पर पहुंच चुका है.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय अलाभकारी और अप्रभावी साबित होने के कगार पर पहुंच चुका है. तीन दिन के दौर पर आई मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) की देखरेख में छह सदस्यीय समिति ने विश्वविद्यालय की मौजूदा हालत का अध्ययन कर यह निष्कर्ष दिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की की रिपोर्ट के अनुसार, समिति की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय पैसों की कमी, अंदरूनी राजनीति और अत्यधिक मुक़दमेबाज़ी के चलते बहुत बुरी स्थिति में पहुंच चुका है.

दरअसल कथित वित्तीय, अकादमिक और प्रशासनिक अनियमितताओं की वजह से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति आरएल हंगलू मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जांच के घेरे में हैं. हालांकि रिपोर्ट में उन्हें विश्वविद्यालय की इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना गया है.

रिपोर्ट में विश्वविद्यालय की दयनीय स्थिति का ज़िम्मेदार सेवानिवृत्त प्रोफेसरों के एक समूह को ठहराया गया है, जो कुलपति को काम नहीं करने देता है.

ऑडिट करने वाली टीम में बेंगलुरु के इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ साइंस के गौतम आर. देसीराजु, मणिपुर विश्वविद्यालय के प्रो. सोइबम इबोटोम्बी, कोलकाता में बोस संस्थान के प्रो. पिनाकी चक्रवर्ती, आईआईएम-संबलपुर के प्रो. महादेव जायसवाल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. अमिता सिंह और सेवानिवृत्त नौकरशाह केपी पांडियन शामिल हैं.



इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ तमाम शिकायतें मिलने के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आदेश पर इस समिति का गठन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने किया है. टीम ने 13 से 15 नवंबर के बीच इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर का दौरा कर यह रिपोर्ट तैयार की है.

समिति ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में निम्नलिखित समस्याओं को रेखांकित किया है:

1. इस केंद्रीय विश्वविद्यालय पर मुक़दमों का बोझ है. वर्तमान में विश्वविद्यालय अदालत में 300 से ज्यादा मुक़दमों को लड़ रहा है, जिसमें विश्वविद्यालय का समय और संसाधन ख़र्च हो रहा है. इन मुक़दमों के पीछे का कारण विश्वविद्यालय के नियमों और अध्यादेशों के घटिया निर्धारण को बताया गया है.

2. विश्वविद्यालय में फंड की कमी से जूझ रहा है. यह विशेष तौर से ग़ैर-योजनागत फंड है जिससे कर्मचारियों की तनख़्वाह और भत्ता दिया जाता है.

3. यूजीसी की आॅडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के पास भविष्य की कोई योजना नहीं है.

4. रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार कार्यालय और वित्त कार्यालय के ख़राब प्रबंधन का भी उल्लेख किया गया है.

5. इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर में सभी समस्याओं और मुद्दों को कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि समस्याओं को उसी तरह से ही निपटाया जाता है. रिपोर्ट का कहना है कि एक अकादमिक संस्थान में ऐसे दृष्टिकोण के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

6. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सेवानिवृत्त प्रोफेसरों के एक समूह द्वारा लगातार जान बूझकर कुलपति के कामों में रोड़ा अटकाया जाता है.


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अलावा 10 अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालय- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, गढ़वाल विश्वविद्यालय, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में भी शैक्षिक, वित्तीय और प्रशासनिक मामलों का ऑडिट सरकार की ओर से करवाया गया है

यह रिपोर्ट the wire hindi.in
से साभार

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